सेक्स को सेक्स ही रहने दो…

यदि प्रकृति ने किसी भी प्रजाति को सेक्स ज्ञान न दिया होता तो यह सृष्टि आगे ही न बढ़ी होती लेकिन प्रकृति ने मनुष्य के अतिरिक्त सभी प्रजातियों के लिए सेक्स और प्रजनन का साल में एक समय अन्तराल निर्धारित किया है । मनुष्य को इसका अपवाद बनाने के पीछे क्या कारण रहा होगा ? मैं सोच नहीं पाती । मनुष्य को बौध्दिक क्षमता के तौर पर भी प्रकृति ने अपवाद ही बनाया है, क्यूँ ? यह भी मैं नहीं जानती । यह अच्छा है या बुरा ? पता नहीं ।  लेकिन इन दोनों अपवादों के साथ मनुष्य अपने आप से पूरी तरह सामन्जस्य नहीं बिठा पाया है । ऐसा मुझे लगता है ।

प्रकृति का फूलना-फलना प्रजातियों के प्रजनन पर निर्भर है अब भला प्रजातियाँ क्यूँ प्रजनन जैसे बोझिल उत्तरदायित्व को उठायें ? किसी भी प्रजाति की मादा से पूछें कि यदि प्रकृति उसे दो विकल्प दे ,पहला -उसके अपने व्यक्तिगत स्वार्थो और लक्ष्यों की पूर्ति और दूसरा- प्रजनन का कार्यभार, तो मेरा मानना है कि लगभग हर मादा पहला विकल्प चुनेगी । किसी भी प्रजाति के पुरुष को यदि प्रकृति स्वेच्छा से इस कार्यभार को वहन करने का आमंत्रण दे, तो संभवतः ही कोई आगे आएगा । क्यूंकि प्रजनन मात्र उभरा हुआ पेट नहीं है ,यह तो केवल उपर से दिखाई देने वाली निशानी है । सीधे सीधे शब्दों में प्रकृति का वो हाल हो गया कि खुद से पूछे ‘अब, तेरा क्या होगा कालिया? ’ अब कालिया को कुटिल बुद्धिबल और प्रलोभन का प्रयोग करना होगा आखिर अब उसके अस्तित्व पर जो आ बनी बात ।  उसने प्रजनन से पहले होने वाली क्रिया ( सेक्स ) को बेहद लुभावना, उत्तेजक और मादक बना दिया । और फ़िर कुटिलता से प्रकृति ने कहा ‘ठहरो, कहाँ चले? प्रजनन मत करो, सेक्स कर लो’ ।

इसमें कम बुद्धि वाली सभी प्रजातियाँ फस गयी और जब तक जान पायें कि क्या हो गया तब तक प्रकृति का खेल पूरा हो गया । अब करो प्रजनन, पसंद हो चाहे न हो । फसा मनुष्य भी और बहुत बुरा फसा क्यूंकि उसके पास प्रकृति ने ऑन-ऑफ बटन (प्रजनन का एक समय अन्तराल) भी नहीं दिया । वो तो हर समय लोभी हर समय तत्पर ।

नारियों के लिए खासी समस्या हो गयी । एक बार का मज़ा और नौ महीने का भुगतान । नर भी अछूते नहीं रहे । गर्भवती नारी के भरण पोषण का अतिरिक्त भार उन पर आ गया और स्वछंदता पर नौ माह की लगाम लग गयी । ऐसे में उसने अपनी बौध्दिक शक्ति के बल पर इस समस्या को सुलझाना चाहा और यह समस्या थी विस्फ़ोटक जनसंख्या वृद्धि की ।

सबसे पहले तो एक नर के लिए एक मादा का नियम आया जिसे हम शादी संस्थान के नाम से जानते हैं । हालाकिं सत्ता की शक्ति यहाँ भी एक नर के लिए एक से ज्यादा नारियां जुगाड़ ले गया मगर सर्वसाधारण के लिए नियम बना रहा । और यदि देखें तो सर्वसाधारण गणना में सत्ताधारियों से कहीं ज्यादा होता है तो नियम का पालन और उल्लंघन दोनों ही समाज में साथ-साथ चलते रहे बिना किसी घर्षण के ।

नियम के साथ ही पटल पर आये कुछ नैतिकता के बंधन : परिवार में मात्र पति-पत्नी ही आपस में सेक्स कर सकते हैं, इसके बाहर होने वाला सेक्स अनैतिक है, आपत्तिजनक है । इसे अधिकांशतः सत्ताधारियों ने भी स्वीकृति दी होगी, ऐसा मुझे लगता है क्यूंकि इतिहास में इसके अपवाद नगण्य हैं ।

कुछ समय सीमा बंधन भी मनुष्य ने लगाने का प्रयास किया : ब्रह्मचर्य और संन्यास आश्रम में सेक्स वर्जित है । मात्र गृहस्थ आश्रम में ही सेक्स नैतिक है ।

मनुष्य ने यत्न बड़े किये । उसने सेक्स को पूरी तरह नैतिकता से जोड़ लिया और नैतिकता का पाश हर मानव को पहनाने का प्रयत्न किया । मगर प्रकृति ने जो खेल खेला उससे मानव पार न हो पाया और हर रोज साबित होता ही रहता है कि प्रकृति और मानव में विजेता प्रकृति ही है । हर शहर और गावं में होने वाले बलात्कार चीख़ चीख़ कर मानव की हार का डंका पीटते हैं । सेक्स को नैतिकता से जोड़ कर नैसर्गिकता से काट कर हमने ऐसा हवुआ बनाया कि जिसके साथ बलात्कार हुआ उसी के लिए गाली बन गया क्यूंकि प्रजनन की क्रिया सबको बता देगी अनैतिक सेक्स के बारे में । और पुरुष ? क्या पहचान है उसकी कि उसने सेक्स किया ? वो तो चला गया- बेदाग़ । लेकिन यदि सेक्स नैतिक-अनैतिक से जुड़ा ही न होता तो ? प्रजनन रोकने के तो कई उपचार हैं आज समाज में । ???

धीरे धीरे मानव बुद्धि यहाँ तक आ पहुंची कि उसे यह भी भूल गया कि सेक्स गोपनीय होता है इसलिए क्यूंकि वो नितांत व्यक्तिगत मामला है इसलिए नहीं कि वो एक घृणित कृत्य है । तो समाज में सेक्स और उससे होने वाली समस्याओं पर बात करना एक तरह से प्रतिबंधित हो गया । क्यूंकि घृणित बातें खुल्लम खुल्ला नहीं की जाती वो तो अंधेरों में छुप के की जाती हैं ।

इसका प्रमाण है समाज में माँ-बहन की गालियाँ ।  यह गालियाँ एक पुरुष दुसरे पुरुष को देता है और भली भांति समझता है कि यह किसी भी पुरुष का सबसे संवेदनशील मामला होता है । उसके परिवार में नर नहीं नारियां ही हैं जो शापित जीवन जीने को बाध्य हो जाएँगी । बात यहाँ यह नहीं है कि स्त्री जाति को गाली का नाम दिया गया, कम से कम मैं ऐसा नहीं सोचती । बल्कि इसके उलट मुझे यह लगता है कि हम जब किसी को चोट पहुँचाना चाहते हैं तो उसके सबसे कमजोर पहलू पर ही पहला वार करते हैं । और माँ-बहन किसी भी पारिवारिक पुरुष की सबसे बड़ी कमजोरी होती है । अब यदि सेक्स को चरित्र की पवित्रता से न जोड़ा गया होता तो ?

ऐसा विदेशों में भी होता है, सेक्स को निम्नकोटि क्रिया समझने का चलन वहाँ भी है । तभी तो गालियाँ वहाँ भी सेक्स के इर्दगिर्द तैयार की जाती हैं – ‘फ*** यू’ । मगर वहाँ नैतिकता और पवित्रता का शिंकजा इतना नहीं कसा कि महिला का जीवन नरक हो जाये इसलिए महिलाएं उनकी कमजोरी नहीं हैं । वहाँ पुरुष अपने आपस में भिड लेते हैं और एक दूसरे को सेक्स वाली गालियाँ देकर निकल लेते हैं ।

अच्छा, इसके ठीक उलट कम बुद्धि वाले जीवों को देखें, ऐसा कोई सिय्यापा ही नहीं है । मेटिंग सीजन आया- चलो, अपनी कला प्रदर्शन से लुभाएँ मादाओं को.. जिसे भा गए उसके साथ सेक्स किया और किसी ने थू-थू भी नहीं की । उनके लिए सेक्स एक नैसर्गिक क्रिया है न कि नैतिक क्रिया ।

मानव ने जिन क्रियाओं को नैतिकता से नहीं बाँधा है वो सब बढ़िया चल रही हैं जैसे – श्वाश क्रिया, पाचन क्रिया, रक्त संचालन क्रिया इत्यादि । एक क्रिया को नैतिकता से बाँधा और बलात्कार, इन्फिडेलिटी, कोठे जैसी न जाने कितनी सामाजिक विसंगतियां पैदा हो गयी ।

मैं यह नहीं कह रही हूँ कि बीते काल में जो कुछ हुआ तो वो ग़लत था । नहीं, बिल्कुल नहीं- वो उस समय काल का सर्वश्रेष्ठ विकल्प था । लेकिन कोई विकल्प समय से परे और समय से निरपेक्ष कैसे हो सकता है ? इस सृष्टि में सब कुछ समय सापेक्ष है । समय बदलने पर पुराने विकल्पों पर चर्चा करना और नए प्रासंगिक विकल्पों पर विचार करना अपराध तो नहीं है । क्यूँ न एक बार नए सिरे से शुरू किया जाये और सेक्स पर खुले दिमाग से चर्चा की जाये । सेक्स के बाद के भयावह प्रभावों पर रोक लगाने के कई आधुनिक तरीके भी हम जान चुके हैं तो क्यूँ ना नैतिकता का शिकंजा एक बार थोड़ा ढीला करके स्वतंत्रता से इस पर बात करें ।

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  1. Deepak Bisht says:

    Good one blogger.

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