कल शहीद दिवस था

कल शहीद दिवस था । मेरा फेसबुक एकाउंट भी बाकी देशवासियों के फेसबुक एकाउंट की तरह भावभीनी श्रद्धांजलि के संदेशों से भर गया । कुछ सन्देश थे जिनमें प्रेमपूर्वक शहीदों को याद किया गया और उनकी शहादत के लिए उनका शुक्रियादा किया गया । कुछ सन्देश ऐसे थे जो न जाने किन भावनाओं के उफ़ान से उपजे थे ।

उनमें बातें थी कि यदि हम भारत को पुनः विश्व गुरु बना सके तभी हमारे शहीदों की कुर्बानी को सही मायने मिलेंगे ।

क्या वाकई ? वाक़ई ! और … पुनः !

सबसे पहले तो मुझे यह नहीं यादआता कि भारत विश्व गुरु कब था ? किसने दी यह पदवी भारत को ?

और यदि यह एक सेल्फ़-प्रोक्लैमेड पदवी है तो भाई आपको किसने रोका है ? आप फ़िर से ले लीजिये यह पदवी । अपनी इन अजीब सी इच्छाओं और विचित्र से ऐतिहासिक ज्ञान के लिए अपने लाखों की शहादत के मायने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया । यह कैसी श्रद्धांजलि है ? बड़ा मन होता है मेरा यह मानने को कि ऐसे लोग भी अपने ही किस्म के देशभक्त हैं और उन्होंने इसी पवित्र भाव के चलते ऐसी बात सोच डाली । अब कुसूर तो इस सोशल मीडिया का है जिसने उन्हें ताक़त दी है कि जो सोचो लिख डालो और शेयर कर दो । जिनके सर पर यह मटका फूटेगा वो खुद ही जाने ‘भागे हम या भीगे हम …..गीला हुआ जो सुखाना होगा ..चाहे जनाना या मर्दाना होगा…अटेंशन !

कुछ सन्देश ऐसे थे कि आज का युवा कैसा सुप्त और पथभ्रष्ट है । उसे २३ वर्षीय भगत सिंह को देखना चाहिए जिसने देश के लिए फांसी चूम ली ।

वाकई ! सुप्त ? पथभ्रष्ट ?

जिसके दिमाग की यह उपज है न जाने वो कौन ब्रीड का कुम्भकरण है ! आये दिन JNU और देश की बाकी यूनिवर्सिटीज के युवा अपनी जागृति का संकेत नए नए धमाकों से देते ही रहते हैं । कौन कहता है कि आज के युवा रक्त में जोश और बारूद नहीं है ? अगर आज के युवा को परिपक्व मार्गदर्शक नहीं मिलते तो क्या यह भी उसका ही दोष है ?

उस समय के भगत सिंह को राह दिखने वाले गाँधी जी, सुभाषचंद्र बोस, वल्लभभाई पटेल और भी कई परिपक्व लोग थे । उस जवानी के जोश को सही दिशा में इस्तेमाल करने वाले काबिल लोग थे । देश को एकजुट करके एक महाभियान छेड़ने वाले जुझारू लोग थे । जो लोग आज देश के युवा को यह ताना दे रहे हैं वो स्वयं किस आयुवर्ग में आते हैं ? दिशा देने वाले या दिखाई हुई दिशा पर चलने वाले ?

थोड़ा उत्तरदायित्व तो उनका भी बनता ही होगा इस पूरे समीकरण में । दुःख होता है जब लोग किसी की शहादत को सम्मानित करने के लिए दूसरों को अपमानित करके तुच्छ बताने लगते हैं । न जाने ऐसे लोग वाक़ई श्रद्धांजलि देना चाहते हैं या बस मौके की तलाश में होते हैं, अपने अन्दर के जहर को उगलने के लिए । इस तरह के संदेशों से अनजाने में ही लोग शहीदों और उनकी शहादत को मैला करने की कोशिश करते हैं ।

यदि ऐसे दिवस मनाने से आपकी देशभक्ति जगती है तो अपने गिरेबाँ में झांकिए और एक छोटा सा ही सही मगर सही दिशा कदम बढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि दें । अन्यथा ऐसे निपट मूर्खता भरे सन्देश न लिखें बस प्रेमपूर्वक उन्हें याद करें । दूसरों पर कीचड़ उछालने को तो बहुत दिन मिल जाते हैं सबको । यह शहीद आपके श्रद्धांजलि संदेशों के लिए शहीद नहीं हुए थे न ही इसलिए शहीद हुए थे कि उनकी शहादत की आड़ में आपअपने गंदे खेल खेलें । हो सके तो थोड़ा सा अपने विवेक का प्रयोग करें और समाज में खिन्नता बढ़ाने का प्रयास रोकें ।

 

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