हँस भी दो

 

अथ श्री महाभारत कथा , हाँ-हाँ महाभारत कथा ।

मैं समय हूँ । सास बहू के बीच संवेदनशील वार्ता का साक्षी समय । मैंने कई बार इन दोनों को एक दूसरे पर आक्षेप करते देखा है । किन्तु यह पहला अवसर है जब यह ऐसे मंथन कर रहे हैं जैसे कुरुक्षेत्र में पार्थ और स्वयं भगवान् श्री कृष्ण । तो चलो, आज तुम्हें भी उस अवसर के घटनास्थल पर ले चलूँ ।

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क्या आप मुझे अपने परिवार का अंग होने की स्वीकृति देंगी, मम्मी जी  ?

हाँ, आओ पार्थ, मैं तुम्हें तुम्हारे दायित्वों से परिचित करा दूँ ।

अबसद…यरलव…ह्क्षत्रज्ञ…आशा है कि तुम इन सभी कर्तव्यों का वहन पूरी निष्ठा से करोगी ।

कुछ माह के पश्चात…..

मम्मी जी, मैंने पूरी निष्ठा से अपने सभी दायित्वों का निर्वाह किया है और कई बार तो स्वयं से बढ़कर इस घर को मान दिया है । दिन भर गृहस्थी के काम काज के बाद मेरी शारीरिक स्थिति मुरझाये पुष्प सी हो जाती है और उस पर आपकी कोप दृष्टि मेरी मानसिक स्थिति को छिन्न-भिन्न कर देती है । क्षमा करें, मम्मी जी, मुझे आपके हाव भाव स्वीकृति से कहीं दूर प्रतीत होते हैं । ‘तुम योग्य नहीं हो ! तुम योग्य नहीं हो !’ यह ध्वनिनाद मेरा चिरस्थायी संगी हो गया है ।

कभी आपको मिलने वाली सर्वसहमति मुझे उदद्विगन कर जाती है तो कभी आपका मातृत्व मुझसे मेरा प्रेम छीन लेता है । कभी मुझे संस्कारों के नाम पर मिलाने वाले उलाहने उलझा देते हैं तो कभी मैं अपनी ही किसी त्रुटि में स्वयं को लहूलूहान पाती हूँ । किस किस पीड़ा का वर्णन करूँ, हे दुखहारणी !

हे माते! मेरा मार्गदर्शन करें, आप मुझे ऐसा कोई सूत्र अपनी कृपा से अभिमंत्रित करके दें, जिससे मैं भी आपके बाकी परिवारजनों की तरह आपके स्नेह का पात्र बन सकूँ ।

हे परिवार संचालिका! मेरी पीड़ा का हरण करें ।

पार्थ, मेरी शरण में आये हो तो अब निश्चिन्त हो जाओ और ध्यानपूर्वक सुनो । स्वीकृति तो एक छलावा है, जिसे अपने यौवन में मैंने भी जिया है ।

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सेवा अधिकारस्ते मा स्वीकृति कदाचना!”

अर्थात् सेवा पर ही तुम्हारा अधिकार है स्वीकृति पर कदाचित नहीं । क्यूंकि स्वीकृति तो तुम्हारे हाथ में है ही नहीं पार्थ, कभी है ही नहीं ।

मेरे अनुभव से सीखो पार्थ अस्वीकृति का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि तुम सदैव चिंतित और पीड़ित रहो । पीड़ा, अरे यह तो एक पड़ाव है, इसे यात्रा का अंत न समझो पार्थ । इससे आगे देखने का यत्न करो । देखो ,आज मैं उस जगह हूँ जहाँ तुम वर्षों पश्चात् पहुँचोगे । देखो इस विराट रूप को । क्या तुम्हें यह आकर्षक नहीं लगता ? पूछो स्वयं से पार्थ कि तुम अपने तात्कालिक व्यक्तिगत स्वार्थों के हाथों अपने आने वाले इस भव्य भविष्य का गर्भपात करा दोगे या फ़िर इस पीड़ा को सहकर इसकी जननी बनोगे ?

क्यूंकि जहाँ आज तुम खड़े हो वहाँ वर्षों बाद कोई और खड़ा होगा और जहाँ आज तुम मुझे देख रहे हो वहाँ तुम होगे पार्थ, तुम होगे । मैंने इस सुन्दर भविष्य के लिए पूरा यौवन समर्पित कर दिया और आज तुम मुझसे मेरी निंदा कर रहे हो पार्थ ? क्या तुम्हें यह न्यायसंगत लगता है कि पहले किसी के लिए और आज तुम्हारे लिए मैं इस सुख से विरक्ति ले लूँ ? पार्थ, जागो और समझो, यह बात मेरी तुम्हारी या पूरे आर्यावृत के किसी भी परिवार की नहीं बल्कि ज्योमेट्री यानि स्थिति विज्ञान की है ।

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कल मेरी स्थिति वहाँ थी …. आज यहाँ है और देखो पूरा रणक्षेत्र ही बदल गया ।

इस अस्वीकृति को हंसकर सहना, यह तुम्हारा धर्म है पार्थ । आने वाले भविष्य के प्रति, तुम्हारे अपने भविष्य के प्रति । इसलिए यह रुदन क्रंदन छोड़ अपने धर्म में अपनी आस्था रखो । यह तुम्हारे सीखने का समय है पार्थ । अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? केवल कुछ माह! और तुम अभी से धैर्य छोड़ रहे हो ? अधीर न हो पार्थ और इसलिए जो कहता हूँ उसे ध्यान से सुनो । जो तुम्हारे हाथ में है उसमे अपना मन लगाओ और व्यर्थ के प्रलाप में समय नष्ट न करो । मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ हर रण में । मैं तो तुम्हारा सारथी हूँ पार्थ, मुझपर शंका कर तुम्हें तुम्हारी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ।

हे माता ! हे ज्योमेट्री ज्ञाता ! हे भविष्य विधाता ! मैं क्षमाप्रार्थी हूँ कि जिन मर्यादों का उल्लंघन स्वयं आप और इस सम्पूर्ण जगत में कोई और नहीं कर सकता मैंने उन मर्यादाओं पर शंका की ।

किन्तु, हे ज्ञान निर्झरी! क्या पुत्रवधू होते हुए सुखी रहना असंभव है ?

हा ! हा ! हा ! नहीं पार्थ, असम्भव नहीं किन्तु रहस्य अवश्य है । देखो ! यदि तुम पुत्रवधू के स्थान पर रहकर भी सुख की कामना करते हो तो कदाचित इन बातों का तुम्हें विशेष ध्यान रखना चाहिए ।

  • मेरे विरोध में कभी न बोलना ,न मेरे सम्मुख और न मुझसे विमुख होकर ।
  • यदि मैं तुम्हें कोई उलाहना दूँ तो चेहरे पर क्रोध के भाव न आने देना ।
  • अपनी सखियों की मुझसे कमियाँ बखान करना और उनकी मम्मी जी के अवगुण गिनाना, किन्तु , सावधानी बरतना ।
  • अवसर मिलते ही संकेत करना कि तुम्हारा नया परिवार तुम्हारे पुराने परिवार से कैसे उच्चतर है ।

चाटुकारिता तो तुम्हें आती ही होगी पार्थ, अन्यथा तुम मेरे पुत्र को कैसे मोहित कर पाती? उसका थोड़ा प्रयोग मेरे लिए भी करो ।

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यदा यदा जो सम्झस्य ऐच्छिक स्वीकृति पायस्य !

अर्थात् जब जब कोई यह समझ लेता है तब तब उसे ऐच्छिक स्वीकृति मिल जाती है । अतः यह समझो पार्थ कि वो समय तो कभी था ही नहीं और है ही नहीं जब बिना चाटुकारिता के कोई किसी नए स्थान या नए परिवेश में सम्मानित किया गया हो । और सम्मान के लिए यह कीमत बड़ी छोटी है पार्थ ।

बैकग्राउंड में गाना बज रहा है-

स्वीकृति तो मिली नहीं, मिला ज्योमेट्री ज्ञान ।

माते का विराट रूप दिखा, सूख गए हैं प्राण ।।

सीख हम बीते युगों से नए युग का करें स्वागत करें स्वागत करें स्वागत करें स्वागत…..

आ आ आ आ आ आ आ आ …..

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2 Comments Add yours

  1. Deepak Bisht says:

    Hahahaha, very nice

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      Thank you 🙂

      Like

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