साहिर लुधियानवी

ऐसा कुछ कर जाएँ, यादों में बस जाएँ, सदियों जहान में हो चर्चा हमारा ।

दिल करदा ओ यारा दिलदारा मेरा दिल करदा ।।

हरदिल अज़ीज़, लुधियाना के जादूगर, साहिर लुधियानवी जी की लिखी यह पंक्तियाँ, ऐसा लगता है, जैसे हर दिल से निकल कर उनकी कलम तक जा पहुंची थी । मैं व्यक्तिगत तौर पर कभी उनसे नहीं मिली, मगर फ़िर भी ऐसा लगता है कि हम दोनों एक दूसरे को जानते हैं । मेरी उनसे पहचान उनके लिखे गीतों से ही है । आज दिल हुआ अपने श्रद्धा के फूल उन्हें समर्पित करने का । कहाँ से शुरू करूँ ? चलिए, यादों के एलबम के पहले पन्ने से शुरू करती हूँ ।

गर्मियों की छुट्टियों में हमारे घर में खास छूट होती थी, देर रात तक बिना किताबों के जगने की । मेरा पसंदीदा काम होता था खा-पी कर एक चटाई, चादर और अपने टू-इन-वन को लेकर छत पर चले जाना । तब रात को तारे ज्यादा दिखाई देते थे और आसमान भी आज के मुकाबले ज्यादा नीला और साफ़ होता था । चटाई पर लेटे और रेडियो स्टेशन ट्यून किया उस मिठास भरी मखमली उद्घोषणा सुनने के लिए ‘यह आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम है, विविध भारती । छाया गीत के सभी सुननेवालों को अमीन सायानी का नमस्कार ।‘ यह उद्घोषणा होती थी सुरीले खज़ाने की तिजोरी खुलने की और फ़िर एक से बढ़कर एक मीठे, गहरे और सुरीले गीत खनकते हुए आस पास बिखर जाते थे । चांदनी रात हो या फ़िर तारों भरी स्याह रात, इत्मीनान भरी तन्हाईयों में वो गीत गीतकार की बनायीं हुई रूहानी दुनिया में ले चलते थे । बूँद बूँद टपकती सुर की ओस आज भी नमी का एहसास देती है ।

आती है सदा तेरी, टूटे हुए तारों से ।

आहट तेरी सुनती हूँ, खामोश नज़ारों से ।।

गीतों का मतलब तब इतना समझ नहीं आता था मगर कुछ शब्द दिल छू जाते थे और धुन होंठों पे टिक जाती थी । कभी कभी गीतकार की कल्पना पर दिल आ जाता था । बड़े ध्यान से सुनती थी कि लिखा किसने है, संगीतबद्ध किसने किया है और गाया किसने है । उन नामों से प्यार हो जाता था । कई नामों के बीच एक नाम जनाब साहिर लुधयानवी जी का था । उनके बहुत से गीत मेरे पसंदीदा हैं।

झुकती घटा, गाती हवा, सपने जगाये ।

नन्हा सा दिल मेरा मचल मचल जाये ।।

कुछ गीत बस एक मीठी सी हल्की गुदगुदी करके, दिल को अपनी शरारतें और आँखों को अपनी चमक देके चले जाते थे । इस गीत पे तो मेरा दिल फ़िदा ही था, क्या मीठी सी नोक-झोंक, भोले भाले तर्कों की धार पर चलती है इस गीत में ।

हम आपको ख़्वाबों में, ला ला के सतायेंगे

हम आपकी आँखों से नींदे ही चुरा लें तो ?

जीतनी बार भी सुनूँ इस भोलेपन पर मुस्कुराये बिना नहीं रह पाती । एक गीत है उनका जिसे सुनकर जोश भर जाता है और आधी रात में ऐसा एहसास होता है मानो सुबह हुई है, इतनी सारी ऊर्जा- क्या करूँ इसका? और वो गीत है-

यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानो का

इस देश का यारों क्या कहना, यह देश है दुनिया का गहना

आधी रात में छत पे नाच भी नहीं सकते, कूटे जायेंगे । तो सारी रात करवटें बदलने में और मन ही मन गाते रहने में खर्च होती थी यह अतिरिक्त ऊर्जा । अगले दिन सर दर्द हो तो भी एक गाना तैयार है-

सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाये

आज प्यारे, पास हमारे, काहे घबराये, काहे घबराये ?

हा! हा! हा! अच्छा, मुझे गाने सुनने और गाना गाने दोनों को शौक है और तब गाने इतने सुन्दर होते थे कि याद हो जाते थे या फ़िर तरुणावस्था में दिमाग के तंतु कुछ तेज़ काम कर लेते हैं । हर सिचुएशन पर एक गीत तैयार रहता था, यहाँ तक कि स्कूल जाते हुए अगर कोई आवारा लड़का कहीं से साथ हो लिया तो मन में यह गीत अपने आप ही बजने लगता था –

रास्ते में रुक रुक

मुड़ मुड़ झुक झुक

देखे मुझे टुक टुक

हाय! सखी री वो क्या मांगे

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि गीतों का मतलब ज्यादा समझ नहीं आता था, कभी शाब्दिक अर्थ समझ आ जाता था तो कभी यह रुक-रुक, झुक-झुक, टुक-टुक तुकबंदी ऐसी प्यारी लग जाती थी कि गाना दिल में बस जाता था । इसका एक फायदा यह भी होता था कि उस थोड़ी देर के लिए मन कोफ़्त और असहजता से हटकर, छुपकर तुकबंदी के मजे लेने लगता था । तो साहिर जी के गीतों ने शुरुवाती दौर से ही मुझे बहुत मजे दिलाये और हर तरह के हालातों को समझने और सुलझाने के लिए मुझे एक फलसफा दिया । मिसाल के तौर पर, साहिर जी का ही वो गीत था जो मैं तब गुनगुना रही थी जब अपने बहुत प्यारे दोस्त से अलग हो रही थी । मेरा दोस्त ऐसे सहज था जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता –

मन रे तू काहे न धीर धरे

वो निर्मोही मोह न जाने, उनका मोह करे

सचमुच, इन गीतों से बुरे समय में बहुत ढांढस मिलता है, लगता है हम अकेले नहीं जो इस विपदा में हैं । हमसे पहले भी कोई ऐसा सह चुका है । जो होता नहीं मयस्सर उसे पाने की हसरत दिल में पालना, यह इंसानी फितरत है । और बात जब दिल की हो तो हसरत चाहत का चोला पहनकर जाने क्या क्या करवाती है दीवाने दिल से, इसकी कोई हद भी नहीं । जब हम अपने दोस्त से बिछड़ गए और जहाँ थे वहाँ जैसे ही मौसम खुशगवार हो, हमारे होंठो पर एक गीत बरबस आ जाता था-

ठण्डी हवाएं लहराके आयें, रुत है जवाँ तुमको यहाँ कैसे बुलाएँ ?

कभी मायूसी सर चढ़ती थी तो यादों की गीतमाला से यह गीत हाथ थाम लेता था-

संभल ऐ दिल, तड़पने और तड़पाने से क्या होगा ?

जहाँ बसना नहीं मुमकिन वहाँ जाने से क्या होगा ?

यह गीत गाकर, दो आंसू बहाकर ग़मगीन हो लेते थे और दोस्त समझते थे कि गाने में डूब गए हम इसलिए आँखें नम हो गयी । जब हम नीदरलैंड्स चले गए और हमारा दिल यहीं रह गया तो अक्सर फ़ोन पर हम गुनगुना देते थे । जो वीज़ा बहुत महँगा न होता और उसके पास पासपोर्ट होता तो दुनिया में किसमे कुव्वत थी कि साहिर जी के बोल, रवि जी का संगीत और हमारी आवाज़ पर उसे हमारे पास आने से रोक लेता ?

यह वादियाँ, यह फ़िजाएँ बुला रही हैं तुम्हें ।

मेरा कहा न सुनो इनकी बात तो सुन लो,

झुकी झुकी सी घटाएं बुला रही हैं तुम्हें ।।

साहिर जी ने मुझे जिंदगी के हर मिज़ाज़ के लिए गीत दिया है । मेरी बेटी को लोरी में मैंने जो गीत सबसे ज्यादा सुनाया वो भी साहिर जी का लिखा हुआ है-

मेरे घर आई एक नन्ही परी

चांदनी के हसीं रथ पे सवार ।

कौन होगा जो बच्चों को खिलाते और बहलाते समय यह न कहता होगा-

गापूशी गापूशी गम गम, किशिकी किशिकी कम कम ।

साहिर जी ने हर अंदाज में गीत लिखें हैं । उनके गीतों को देखें तो एक पूरी शख्शियत उभरकर सामने आती है । कभी वो देश प्रेम में झूमते हुए दिखाई देते हैं तो कभी बुराईयों की तरफ खुलकर अपनी बात कहते हैं ।

यह जलते हुए घर किसके हैं, यह कटते हुए तन किसके हैं ?

तकसीम के अंधे तूफान में , लुटते हुए गुलशन किसके हैं ?

कभी बहुत प्यार से प्रेमिका को पास बुलाते हैं, रिझाते हैं, तारीफें करते है और कहते हैं –

तेरा इश्क, मैं कैसे छोड़ दूं ? मेरी उम्रभर की तलाश है ।

मेरे शौक-ऐ-खाना ख़राब को तेरी रहगुज़र की तलाश है ।।

तो कभी अपने इश्क़ का नाज़ दिखाते हुए कहते हैं –

हुस्न का नाज़ ही क्या, हुस्न तो ढल जाता है ।

बहार-ऐ-हुस्न सलामत, खिज़ा से पूछ ज़रा,

के चार दिन में, बहारों का हाल क्या होता है ?

अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी कभी कभी ऐसा होता है कि हमारे हालत वही के वही रहते हैं । ऐसे में हम खुद से बड़ी, बहुत बड़ी, किसी ताक़त की तरफ देखते हैं, जादू की आस करते हैं । यह बड़ी ताक़त जिसे हम मालिक कहते हैं और जादू जिसे हम उसका करम कहते हैं-

जब तुझसे न सुलझें तेरे उलझे हुए धंधे,

भगवान् के इन्साफ पर सब छोड़ दे बन्दे ।

जो कुछ है तेरे दिल में, वो सब उसको खबर है

बन्दे तेरे हर हाल पे, मालिक की नज़र है ।।

कॉलेज के दिनों में जब खून में बड़ी गर्मजोशी होती है, अचानक अपने आस पास सब कुछ ग़लत दिखाई देता है और  हम सब विद्रोही हो जाते हैं । इंक़लाब लाने का सपना आँखों में होता है । हम जब ऐसे दौर में आये तो नारी शोषण के खिलाफ़ दिल बेचैन हो गया था और नारी शक्ति पर बोलने लिखने का बहुत मन हुआ । मैं जब भी कुछ लिखती हूँ तो हिंदी गीतों के कुछ टुकड़े बीच बीच में अपनी जगह बना ही लेते हैं । ऐसा लगता है हिंदी गीतों ने बहुत हद तक मेरी सोच और मेरे फलसफे को आकार दिया है । गीतों के बिना मेरे लेख मुझे ऐसे मालूम देते हैं जैसे बिना आत्मा के शरीर । तो उस समय साहिर जी का लिखे हुए यह बोल मेरे लेखों में आ जाते थे-

मर्दों ने बनायीं जो रस्में,  उनको हक़ का फ़रमान कहा ।

औरत के ज़िन्दा जलने को, क़ुरबानी और बलिदान कहा ।

किस्मत के बदले रोटी दी, उसको भी एहसान कहा ।

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया ।।

बहुत ही गहरी और कड़वी बातें साहिर जी ने महसूस की और लिखी । दिल्ली में जब निर्भया कांड हुआ तब दिल से बार बार यह चीख़ उठती थी-

जला दो, जला दो, जला दो इसे, फूँक डालो यह दुनिया ।

मेरे सामने से हटा लो यह दुनिया ।।

दोस्ती अपने आप में एक बहुत पाक रिश्ता है और दोस्त जान से ज्यादा अज़ीज़ होते हैं । यूँ तो हर कोई अपनी दोस्ती को एक नज़र का टीका लगाना चाहता है । लेकिन कभी कभी ऐसी गलतियाँ या ग़लतफ़हमियाँ दोस्ती में आ जाती हैं, जो इसे तोड़ देती हैं और सुलह की कोई राह नहीं सुझती । दिल ज़ार-ज़ार हो यादों में घूमता रहता है, रोता रहता है, बार बार उसे आवाज़ देता है कि लौट आओ । मगर वो दोस्त नहीं लौटता, और ज़िंदगी इतनी मेहरबान नहीं होती कि आपके टूटे दिल का लिहाज़ करे और बाकी जिम्मेदारियों से आपको आजाद कर दे । लगभग साल भर की नाकामियाब कोशिश के बाद मैं इस ख्याल के साथ आगे बढ़ पाई-

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो  उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाये तो  उसको तोड़ना अच्छा ।

वो अफ़साना जिसे अंजाम तक  लाना ना हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर  छोड़ना अच्छा ।।

मैंने अपनी तरफ से उसे माफ़ कर दिया और एक मेल की अपनी गलती मानते हुए, आखिरी बार माफ़ी मांगते हुए और फ़िर उसका इंतज़ार करना छोड़ दिया । साहिर जी के सिवा और कौन मुझे यह सलाह दे पाता ? शायद किसी को मैंने अपने दिल के करीब आने नहीं दिया या फ़िर किसी और को गुरु और मार्गदर्शक के तौर पर स्वीकार नहीं किया । हर हाल में जिंदगी का साथ ख़ुशी से निभाने का फ़लसफ़ा भी उनके गीत बखूबी देते हैं

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया ।

हर फ़िक्र को धुवें में उड़ाता चला गया ।।

जब तुमसे मुहब्बत की हमने, तब जाके यह राज़ खुला ।

मरने का सलीका आते ही, जीने का सहूर आ जाता है ।।

साहिर जी से मुझे बेपनाह मुहब्बत है और मैं उनकी बेहद इज्ज़त करती हूँ । उन्होंने जो लिखा उसकी मुझपर बहुत गहरी छाप पड़ी है । कभी कभी सोचती हूँ कैसी अजीमोशान रही होगी उनकी हस्ती ! कितने रूहानी और खूबसूरत लगते होंगे जब सारी दुनिया को विदा करके अपनी ही दुनिया बनाते होंगे, एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ पर शायद ठुड्डी टिकी होती होगी । साहिर जी ने बहुत बड़ी और खूबसूरत विरासत छोड़ी है अपने हसीं ख्यालों, अपने दिल के छालों और अपने प्यार भरे ज़ज्बातों की । उनके गीत आइना हैं उनकी खूबसूरत कल्पनाओं का । कल्पना में असल जिंदगी की तरह पाबंदियां नहीं होती तो इंसान पूरी ईमानदारी से वो बन सकता है जिसे उसका दिल और उसका ज़मीर सही मनाता है । और अगर इस कल्पना को वो किसी भी तरह अभिव्यक्त कर सके तो वो अभिव्यक्ति ही सही मायनों में उस इंसान का परिचय है । जो परिचय साहिर जी का मुझे मिला है वो कबिले इबादत है । इतने हसीं गीत लिखने वाले गीतकार साहिर जी बहुत मॉडेस्ट भी थे और उन्होंने लिखा

कल और आयेंगे नगमो की खिलती कलियाँ चुनने वाले ।

मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले ।।

साहिर जी, मैंने बहुत से गीतकारों को सुना है और वो बेहद अच्छा लिख लेते हैं लेकिन मैं यह कभी भी नहीं कह सकूंगी कि आपसे बेहतर लिख लेते है वो । साहिर जी यू आर द बेस्ट । वैसे तो शब्दों का बहुत बड़ा कोष है मेरे पास, लेकिन आपकी शख्शियत इतनी विराट है कि कोष में हाथ डालना भी आपकी तौहीन लग रहा है । बस इतना ही कहूँगी, यादों के साज़ पर बज रहे हैं आपके लिखे अल्फाज़, दिल की धडकनों में गूँज रहा है प्यार का यह नगमा –

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है,

कि जैसे तुझको बनाया गया है मेरे लिए ।।

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