अधूरा प्यार

इश्क़ नचाये जिसको यार

वो फिर नाचे बीच बाज़ार

बीच बाज़ार कोई जोगी नाचेगा या जोगन नाचेगी , कोई कान्हा नाचेगा, कोई राधा या कोई मीरा ही नाचेगी | हलकी सी चुभन होती है कि कान्हा राधा और मीरा दोनों के साथ प्रेम संबन्धों के लिए जाने जाते हैं मगर रुक्मिणी ? एक पत्नी होने के नाते मुझे रुक्मिणी से विशेष सहानुभूति है | एक प्रेमिका के रूप में मैं अपने प्रेमी की राधा होना चाहती हूँ, मीरा होना चाहती हूँ, लेकिन, रुक्मिणी….हम्म्म्म..शायद नहीं | कितना आश्चर्यजनक है कि राधा और मीरा दोनों को ही कान्हा नहीं मिले, फिर भी, प्रेम उन्ही का पूजनीय है | मगर रुक्मिणी ..उसको भी तो कान्हा नहीं मिले, उसे तो कृष्ण मिले थे | और कान्हा, उसे भी राधा कहाँ मिल पायी ? यह सब अधूरे प्रेम हैं जिनमे प्रेम की ऐसी टीस, ऐसी कसक और ऐसा समर्पण है जो प्रेम की पूजा करने को बाध्य कर देती है |

कान्हा नाम था एक ऐसे व्यक्तित्व का जो मस्त, अल्हड़, नटखट, केशों में मोरपंख को एक्सेसरीज़ की तरह पहने वाला स्टाइल आइकॉन, माखनचोर, बांसुरी वाला, चित्तचोर था | कहाँ थी उनमे कोई परिपक्वता ? कहाँ था गोकुल छोड़ मथुरा जाने का कोई ख्याल ? वहाँ तो बस बालपन था, रस था | राधा थी अपने प्रेम पर अंधविश्वास करने वाली प्रेमिका | कान्हा चाहे कितनी भी गोपियों के संग रास करे मगर कान्हा है तो बस मेरा, ऐसा अखण्ड विश्वास था राधा के प्रेम में | और ईसी विश्वास ने राधा को हमेशा ईर्ष्या से दूर रखा | दोनों का प्रेम शारीरिक नहीं आत्मिक था, ऐसा पावन संगम जहाँ दोनों के ह्रदय मिले हुए थे | बांसुरी दोनों के प्रेम की साक्षी थी और कान्हा की पहचान | कौन कान्हा को बांसुरी से अलग सोच सकता है ? जब कान्हा ने गोकुल छोड़ा तो राधा को छोड़ते समय कान्हा को चिंता थी राधा उनके बिना कैसे जी पायेगी ? क्या ऐसा दूँ राधा को जो उसे जिन्दा रख सके ? बहुत सोचने के बाद कान्हा ने अपनी बासुरी, अपनी पहचान राधा को दे दी | उन्होंने राधा से कहा होगा ‘राधे, आज मेरा एक हिस्सा मैं तुम्हें दे कर जा रहा हूँ | मेरी बांसुरी ने मोहा सबको, मगर मैंने, हमेशा बांसुरी बजायी अपनी राधे के लिए | अब कान्हा कभी बासुरी नहीं बजाएगा ‘| कान्हा गोकुल में अपना मस्ती, अल्हड़ता, नटखटपन और बांसुरी सब छोड़ चले | साथ ले गए तो अधूरे प्रेम की टीस | और राधा… अब बांसुरी उसकी पहचान बन गयी और वो जोगन हो गयी और उसके अधूरे प्रेम की टीस पूरे गोकुल को सुनाई देती होगी |

गोकुल से निकले तो कान्हा कृष्ण बन गए | परिपक्व, कंस से बदले की आग में जलते कृष्ण, द्रौपदी को बचाने की चिंता में आकुल कृष्ण, एक भीषण युद्ध में सारथी की भूमिका निभाने वाले कृष्ण, गीता ज्ञान देने वाले कृष्ण | यह जिम्मेदारियों से बोझिल और दुनियादारी से रंगे कृष्ण मिले रुक्मिणी को | उनके पास समय ही कहाँ था प्रेम के लिए ? या शायद परिपक्वता में प्रेम प्रदर्शन के तरीके बदल जाते हैं ? रुक्मिणी को उनकी बराबरी का, अर्धांगिनी होने का अधिकार मिला मगर वो सरस, सरल प्रेम ना मिला जिसे हर प्रेमिका चाहती है | जब मनचाहा कुछ पूरा ना मिलकर हिस्सों में मिले तो मन थोड़ा कुटिल या विषाक्त हो जाता है | तो रुक्मिणी को भी राधा से ईर्ष्या हो गयी और शायद यहीं उसके प्रेम ने राधा और मीरा के प्रेम से मात खाई | एक बार रुक्मिणी ने बहुत प्रेम अनुरोध किया फिर पत्नी होने का अपना अधिकार भी जताया मगर फिर भी कृष्ण ने बाँसुरी अधरों पर ना धरी | कैसा विषादपूर्ण अवसर होगा वो रुक्मिणी के लिए और शायद कृष्ण के लिए भी ? प्रेमिका रुक्मिणी ने अपने कृष्ण को नहीं छोड़ा और समझौता कर लिया यथार्थ से | शायद इसे भी परिपक्वता ही कहते हैं | मगर रुक्मिणी के दिल की टीस तो कृष्ण ने सुनी होगी और मुखर तौर पर ना कहा हो पर सोचा तो होगा ‘हमारा दुःख एक ही है, प्रिये, मैं भी उसे संपूर्णतः कहाँ पा सका जिससे दिल तोड़ प्रेम किया’ |

फिर आई मीरा, एकतरफ़ा प्रेम की मिसाल लिए | मीरा ने भी कान्हा को ही चाहा, कृष्ण जैसा मजबूर प्रेमी और दुनियादारी में प्रवीण कैसे लुभाता उसे | सांसारिक तौर पर मीरा को कभी कान्हा का साथ नहीं मिला | उनका प्यार ऐसा था –

कहाँ नज़र टकराई

दिल यह किस पर आया

वो कहाँ मैं कहाँ

दिल कहाँ उलझाया

अक्सर एकतरफ़ा प्यार ऐसे होते हैं जो अधूरे प्यार को बहुत दिलकश और हसीं बना देते हैं | ‘तुम्हें प्यार करने के लिए मुझे तुम्हारी ही ज़रूरत नहीं’- ऐसी दिलेरी और मस्तमौलापन कि दोतरफ़ा प्यार में रहने वाले भी रश्क़ कर बैठें | मीरा का दीवानापन भी कुछ ऐसा ही था | साक्षात् कान्हा ना मिले तो उनकी मूर्ती से ही ब्याह कर लिया | ना राधा से ईर्ष्या की ना रुक्मिणी से | कान्हा के अलावा कुछ देखा ही नहीं, कुछ सोचा ही नहीं | कैसा अनन्य और पावन रहा होगा वो ह्रदय, जिसने विषपान तक कर लिया अपने प्रेम के लिए, ऐसा प्रेम जो पूरा होना कभी संभव ही नहीं था | वो भी अपने अधूरे प्रेम की टीस दुनिया को अपने गीतों में सुनाकर चली गयी |

यह सब पात्र असल ऐतिहासिक हैं या फिर काल्पनिक ? इस चर्चा में हम नहीं पड़ेंगे | मगर यह सब इतने जीवंत हैं कि हमारे चारों ओर हर एक बालक मोहन है और राधा इक इक बाला | कभी ना कभी देखा होगा अल्हड़ लड़कों के गुट को रिस्ट्रिक्टेड एरिया में घुस कर बकर करते हुए | कभी ना कभी देखा होगा मस्ती में लड़कों को गाते हुए और किसी ना किसी लड़की को उनके प्यार में पड़ते हुए | कभी आशिक़ को इश्क़ में फूल, कार्ड और गिफ्ट्स देते हुए | इन सब में एक कान्हा जी रहा होता है | जिसमें कोई परिपक्वता नहीं होती, जिसे कहाँ ख्याल होता है कि कॉलेज से निकल कर ऑफिस जाना होगा ? वो तो पूरी तरह से अपने आज में जी रहा होता है | और हर इक लड़की में एक राधा होती है भोली सी, जिसे पता ही नहीं होता कि कान्हा कृष्ण बन जायेंगे | अगर इनका साथ कॉलेज में ही छूट गया तो यह दोनों अपनी-अपनी एक पहचान वहीँ छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं | और अगर दोनों का ब्याह हो जाये तो भी राधा का प्रमोशन हो जाता है और वो रुक्मिणी हो जाती है | अब रुक्मिणी कितना भी कहे, जिम्मेदारियों और काम के बोझ तले दबा कृष्ण फूल, चॉकलेट, कार्ड और गिफ्ट से परे ही रहता है | उसका प्रेम प्रदर्शन परिपक्व हो जाता है | और मीरा, एक ऐसी शादीशुदा लड़की जो किसी दूसरे शादीशुदा लड़के से प्रेम कर बैठे | तो आज भी समाज में उसे उसी तरह यातनाओं, भर्स्तनाओ का सामना करना होगा और अंततः विषपान ही उसकी नियति होगी | कितना आश्चर्यजनक है, यह, कि हम द्वापर युग से कलियुग तक का सफ़र तय कर आये, लेकिन, ना समाज बदला, ना कान्हा बदला, ना कृष्ण बदला, ना राधा बदली, ना रुक्मिणी बदली, ना मीरा बदली और ना प्रेम बदला ! 

इन प्रेम के दीवानों को पढ़ती हूँ और फिर आधुनिक काल के लैला-मजनू जैसी कहानियाँ सुनती हूँ तो मन में सवाल उठते हैं  – क्या प्रेम को जिन्दा रखने का जिम्मा इन टीस भरे दिलों का है ? क्या प्रेम अधूरी प्रेम कहानियों का ऋणी है ? क्या प्रेम पर जोगी और जोगन का ही अधिकार है? क्या लोग सच कहते हैं ‘प्यार कभी पूरा नहीं होता’?

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s