पूजा नहीं मानवीयता ऐच्छिक है

यत्र नार्यन्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता 

बहुत से ज्ञानी और उदारह्रदय गुणीजन अक्सर महिलाओं के पक्ष में बात करते समय उपरोक्त श्लोक का प्रयोग करते हैं । जब भी कहीं कोई महिला सशक्तिकरण का मोर्चा सम्भाल रहा हो तो दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी और सीता का उदाहरण दिया जाता है । यह सारी चर्चा पूरी तरह से mythological है । आज के युग में, ना कोई देवताओं को मनाता है, ना पूजा को मनाता है और ना ही उसे इन mythological व्यक्तित्वों के धरती पर अवतरित होने की कोई कल्पना भी है । ऐसे में महिलाओं को प्रेरित करने, आत्म-ज्ञान और स्वयं शक्ति के परिचित कराने के लिए ऐसे उदाहरण कारगर है या हास्यापद हैं, इस पर मैं कोई टिपण्णी फिलहाल नहीं करुँगी । मगर मैं जब भी ऐसा कुछ सुनती और पढ़ती हूँ तो मन में एक प्रश्न अनायास ही दस्तक देता है – नारी की उच्चतम गरिमा, प्रतिष्ठा और पहचान केवल myth में क्यूँ है? कुछ tangible, कुछ वास्तविक क्यूँ नहीं है ?

नारियाँ या तो शोषित की जाती हैं या फिर देवी बना दी जाती हैं । यह दोनों ही उसके मानवी होने के सभी आयामों को पूरी तरह से नकारते हैं । कोई उसे इस तरह निम्न स्तरीय समझता है जैसे नंगे पावँ चलते हुए ग़लती से पैर गोबर में पड़ गया हो । और वो उस गोबर से निजात पाने के लिए अपनी चप्पल जमीन पर पूरी शक्ति से पटक रहा हो । जब पटकने से काम ना बने तो चप्पल आड़ी तिरछी कर किसी नुकीले पत्थर पर रगड़ रहा हो । और बेचैन होकर पानी का कोई स्त्रोत ढूँढ रहा हो जहाँ अपनी चप्पल और पैर दोनों को साफ़ कर सके । ऐसे लोग अक्सर महाकवि तुलसीदास का आश्रय लेते हुए कहते हैं, कि राम चरित मानस जैसा पावन महाकाव्य रचने वाले, समाज को मर्यादा सिखाने वाले और प्रभु से मिलवाने वाले दिव्य मानव ने ग़लत नहीं लिखा होगा-

ढोल गवार शुद्र पशु नारी,
सकल ताड़ना के अधिकारी ।

ऐसे लोग ताड़ना को केवल प्रताड़ना का पर्यायवाची ही समझ पाते हैं और उपरोक्त पंक्तियों को अपने  अभद्र व्यवहार और निम्नकोटि मानसिकता को justify करने के लिए प्रयोग करते हैं ।  यह कुछ वैसा ही दुखद और हास्यापद है जैसे कोई सन्न और प्रसन्न को पर्यायवाची समझे । ऐसे लोगों को मैं इस लेख के माध्यम से ताड़ना का एक सही अर्थ बताना चाहूंगी और वो है – पहचानना या परख । वैसे तो हमारे युवा यह अर्थ समझते ही होंगे, क्यूंकि, कौन युवा है जो युवतियाँ नहीं ताड़ता ! तुलसीदास जी की बात शायद कुछ यूँ थी कि ढोल का संगीत महसूस करने के लिए उसके सुर को पहचानना जरूरी है । गवार, शुद्र उस समय की जाति व्यव्यस्था में निम्नतम कोटि के समझे जाते थे और तिरस्कार के पात्र होते थे। और शायद तुलसीदास जी व्यथित थे- शूर्पणखा के प्रेम निवेदन को मिले अमानवीय प्रत्युत्तर से, सीता के अपहरण से, गर्भवती सीता के वन प्रयाण से । आदरणीय तुलसीदास जी ने उस समय की इन बुरी स्थितियों में परिवर्तन लाने के उद्देश से ऐसा लिखा था । किन्तु, कविवर, ऐसे मनुष्यों की शब्दावली ज्ञान को टटोलने में चूक गए ।

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई !

अब बात करते हैं उस समुदाय की जो कन्याओं के प्रति एक दैवीय भाव रखते हैं । पुत्री पैदा हुई तो गदगद ह्रदय से घोषणा होती है, ‘लक्ष्मी’ आई हैं । पुत्र होने पर यह कभी नहीं कहेंगे कि विष्णु या महेश आये हैं । तो ऐसा कदापि नहीं है कि यह लोग माइथोलॉजी में ही सोचते, कहते और जीते हैं । हाँ, यह ज़रूर है लडकियों की बात आते ही यह myth का शिकार होने लगते हैं । अपहरण हो जाये किसी का तो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देनी होगी उसे, अपने शील की पवित्रता प्रमाणित करनी होगी उसे । ऐसे लोग यह समझ ही नहीं पाते कि यह देवी नहीं मानवी है, जिसे वो सब कुछ महसूस होता है जो एक मानव को होता है । जीवन के सुख, दुःख उस पर वैसा ही असर करते हैं जैसा एक मानव पर करते हैं । रावण ने इसलिए सीता नहीं हर ली क्यूंकि उसने अपनी सीमा लांघी थी, बल्कि इसलिए हर ली क्यूंकि वो सीता हरण के लिए ही आया था । अपहरण होने का कारण कोई लक्षमण रेखा लांघना ही नहीं बल्कि किसी की कुदृष्टि, किसी की कामुकता या किसी का प्रतिशोध हो सकता है । अपहरण और कुकर्मो का कारण छोटे कपड़े, शराब, सिगरेट, उन्मुक्त हंसी या मादक ईशारे नहीं होते बल्कि कुकर्मियों के अपने इरादे होते हैं । सीता हरण को ना लक्षमण रेखा बचा सकती थी, ना सीता, यदि कोई सीता हरण बचा पाता तो वो, केवल और केवल, ख़ुद रावण ही था । सभी राजा, महाराजा और दैवीय पुरुष पात्रो की प्रायः एक से ज्यादा पत्नियां होती हैं किन्तु कोई वृतांत ऐसा ना मिलेगा जहाँ इस वजह से उन्हें अपमानित होना पड़ा हो । अब जरा द्रौपदी की चर्चा करें तो उसके अपमान का एक बड़ा कारण था – एक से ज्यादा पतियों का होना । आज भी स्थिति बहुत अलग नहीं है । जितनी ज्यादा गर्लफ्रेंड्स हों तो लड़के का cool quotient उतना ही ज्यादा होता है । एक से ज्यादा बॉयफ्रेंड्स हों तो लड़की का character quotient उतना ही dip मार जाता है । क्यूंकि लड़का तो लड़का है लेकिन लड़की- वो तो सती, पार्वती और सीता है । यह सब तो एक योग्य जीवनसाथी के लिए वर्षों घनघोर तप करती है और इनका अनुराग अविचल होता है । जब भी कोई लड़की परिस्थियोंवश इन मापदंडों पर थोड़ा सा चूक जाये तो उसे दैवीय मनानेवाले लोग ऐसी निंदा और ऐसा दुर्वव्यहार करते हैं जैसे दुर्वासा ऋषि का श्राप ।

नारी की समस्याओं के मूल में यही मानसिकता है, उसे मानवी नहीं देवी होना पड़ता है । इसी में कहीं ना कहीं, कभी ना कभी वो चूक जाती है और उसका स्थान तुरंत ढोल, गवार और शुद्र के बीच कर दिया जाता है । दोनों ही परिस्थियों में नारी को जीवन और उसके मूल अधिकार कभी नहीं मिलते । उसे बराबरी कभी नहीं मिलती ।

मैं सभी से (महिला और पुरुष और जो इन दोनों लिंगों की परिभाषा से बाहर हैं) यह विनम्र निवेदन करना चाहती हूँ कि एक मानवी को मानवी हो रहने दो, उसे देवी ना बनाओ । उसे जीवन साधारण ढंग से जीने दो , उसे अपनी पूजा का पात्र मत बनाओ । उससे इतने ऊँचे मापदंडो पर खरा उतरने की अपेक्षा ना करो जो एक मानव के लिए अनपेक्षित है । माँ को बस त्याग, बलिदान, सहिष्णुता, शीलता और प्रेम की मूर्ति नहीं कभी एक साधारण, स्वार्थी, परिस्थितियों से हारी, गलतियाँ भी करने वाली और जीवन समर में संघर्षरत मानवी भी समझो । माँ को सम्मानित करने के अपने कारणों पर नज़र डालो और हो सके तो बदलने का प्रयास करो । यदि ऐसा कर सके तो केवल अपनी माँ ही नहीं बल्कि उन सारी माताओं को स्वीकार कर सकोगे जिनमे से कुछ housewife हैं, कुछ career oriented हैं, कुछ sexworker हैं और कुछ बलात्कार का शिकार हैं । वो सब मानवी हैं, उन्हें दैवीय मापदंडो पर चूक जाने की वजह से या किसी दूसरे मानव की गलतियों की वजह से सम्मान से वंचित ना करो । महिलाओं का सम्मान करो और उन्हें स्वीकार करो बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम एक पुरुष को करते हो । बहुत हुआ myth में बहकाना और myth का रस लेना, ज़रा असलियत की तरफ रुख करो, क्या पता एक साधारण मानवी भी सराहने और प्रेम के योग्य हो !

🙂

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