जय जय शिव शंकर

ओ जय जय शिव शंकर

काँटा लागे ना कंकड़

यह प्याला तेरे नाम का पिया ।

मैं गिर जाऊँगी

मैं मर जाऊँगी

जो तूने मुझे थाम ना लिया । ।

ओ सौं रब दी । –

अरे बजाओ रे भईय्या….ढोल, मंझीरे, झांझर…. अरे नाचो रे भईय्या

आज शिवरात्रि है, कई लोगों के आराध्य की शादी का दिन । मगर बुरा ना मनाना दोस्तों, मेरे लिए तो

आज मेरे यार की शादी है, यार की शादी है, मेरे, दिलदार की शादी है ।

ऐसा लगता है, सारे संसार की शादी है, आज मेरे यार की शादी है । ।

दिल झूम झूम के नाच रहा है, कानों में यही संगीत बज रहा है, और आँखों में ‘सोनू बैंड’ वाले की बग्घी पर मेरे शिव खड़े हैं । मस्त भांग चढ़ी है भेजे को और कलम भी बहक रही है । आओ तुम भी आमंत्रित हो मेरे दोस्त की शादी में । चलो तुम्हें अपनी निराली दोस्ती के बारे में कुछ बताएं –

मेरा और मेरे शिव का रिश्ता बहुत पुराना और अनोखा है । पुराना उतना जितना मेरा बचपन पुराना है और अनोखा उतना जितना ख़ुद अनोखापन अनोखा है । मेरी माँ बहुत धार्मिक है , नित्य स्नान कर पूजा पाठ करना उनके लिए सांस लेने जितना ज़रूरी काम है । हमारे घर में बहुत से देवी देवताओं की तस्वीरें और कुछ मूर्तियाँ हैं । मैंने माँ से पूछा कि यह सारे देवी देवता तो इतने सुन्दर बने हुए हैं और कितने सारे आभूषण और सुन्दर सी पोशाक में हैं फिर यह शिव जी ऐसे क्यूँ हैं ? नीले-नीले, बागम्बर पहने, साँप गले में लपेटे और विभूति से सने हुए । माँ ने उनके नीले होने की कहानी बताई लेकिन बाकी सवाल अनुत्तरित ही छोड़ दिये ।

मेरी जिज्ञासा बढ़ती गयी और मैंने उनकी तरह-तरह की तस्वीरें इक्कठा करना शुरू कर दिया । उन दिनों इंटरनेट नहीं हुआ करता था तो जो भी आपका शौक है वो पूरा करने के लिए ख़ुद ही गूगल बनना पड़ता था । महाकाल की ढेरो तस्वीरों के साथ मैं चलता-फिरता गूगल (इमेज सर्च इंजन) हो गयी थी । मैं अक्सर ही सोच में डूबी उन तस्वीरों को देखती रहती थी । कब मुझे शिव से प्यार हो गया, ठीक-ठीक तो नहीं कह सकती पर अंदाज़न 12 साल की रही हूँगी मैं । यह प्यार वो नहीं था जो मेरी माँ को शिव से था, बल्कि यह वो प्यार था जो मीरा को अपने मोहन से था । मुझे वो गज़ब सेक्सी लगते थे, आज भी लगते हैं ।

क्या गठा हुआ शरीर – पुरुषत्व की हद,

उस पर चीते की खाल –वाइल्डनेस की अल्टीमेट हद,

गले में साँप – हर पल चौक्कना होने का एहसास,

जटाओं में अबाध्य, तड़ित वेग वाली गंगा बंधी हुई – शक्ति का अप्रतिम परिचय,

हाथ में त्रिशूल – रक्षा का उपाय,

दूसरे हाथ में डमरू – संगीतप्रेम की डुगडुगी,

माथे पे चाँद – ख़ूबसूरती और शीतलता का तड़का,

और ताण्डव नृत्य की मुद्रा में – शक्ति, प्रेम, दुःख, कला और क्रोध की अभिव्यक्ति ।

इतना कुछ एक में मिल रहा हो तो मैं कैसे किसी और को चाहूँ ? मेरे जीवन का पहला प्यार हैं मेरे शंभू, मेरे भोले ।

बहुत समय उनके प्रेम में बीता और कभी विचार भी नहीं आया कि जैसा मैं उनके लिए महसूस करती हूँ वो सही है या नहीं ? मीरा जैसी भोली नहीं थी कि उनसे शादी की बात सोच सकूँ मगर…… पता नहीं । दिन प्रेम के डमरू पे नाचता चला जा रहा था कि अपनी कोचिंग क्लास में किसी से टकरा गयी मैं । उसका भोला सा (यह तो आज लगता है ) कमेंट नश्तर की तरह चुभ गया । उससे तो कुछ नहीं कहा मगर मन ही मन गुस्सा बहुत आया । खैर, बाकी का दिन ठीक से गुज़र गया और मुझे लगा कि मैं भूल गयी हूँ उस बात को । रात को रोज़ की तरह खा पी कर सो गयी । आधी रात को हडबडाकर उठी, सपना ही ऐसा देख लिया था । सपने में मैंने देखा कि मैं शिव मंदिर में किसी बात पर रो रही हूँ और तभी वहाँ कोचिंग का वही लड़का आया और दूर से मेरे शिव चले आ रहे हैं । वो लड़का मेरे सामने खड़ा हो गया और मैं अपने शिव में ही खोयी हुई थी । ज़रा ही देर में शिव मेरे पास आये और उस लड़के के हाथ में मेरा हाथ देकर बोले ‘यह तुम्हारा ख्याल रखेगा’ । मैं अवाक थी कि मेरे शिव यह क्या कह रहे हैं ? और वो भी उस लड़के के लिए जो मुझे फूटी आँख पसंद नहीं है ? वो कैसे सोच सकते हैं कि उनकी जगह यह लड़का ले सकता है ? नहीं, उनकी जगह कोई नहीं ले सकता, मैं मन में यह सोच तो रही थी मगर होंठो तक यह शब्द नहीं आये । अपने शिव पे शक़ इतने मुखर तौर पे कैसे करती? वो भी क्या कहते ‘यही है तुम्हारा प्यार, तुम्हारा विश्वास’ ? बस इतना देखा और हडबडाकर जाग गयी और फिर बाकी की रात नींद नहीं आई ।

अगले दिन मैं कोचिंग गयी और कनखियों से उसे ढूँढा और अपने शिव से मिलान करने की सोची । बहुत मायूसी हुई, कहाँ मेरे शिव और कहाँ यह दुबला पतला सा मूँछ वाला चश्मिश ! मैं पागल हो गयी हूँ जो सपने को इतना सीरियस ले रही हूँ । सपना ही तो था, भूल जाऊँगी कुछ दिन में । ऐसा सोचकर मैं आगे बढ़ चली । मगर मेरे शिव मेरी सृष्टि सृजन में लग गए थे । इशारा कर चुके थे वो । मैंने नकारने की बहुत समय कोशिश की और सपना भूलने की भी, पर तेरी मर्ज़ी से बड़ी मेरी मर्ज़ी कब है, मेरे भोले ? सालों उसे समय की कसौटी पे खरे उतरते देखने के बाद मैं इस बात से सहमत हुई कि यह दुबला पतला चश्मिश ही मेरा शिव है । मेरे सालों के प्रेम को शिव ने उसी तरह अपना प्यार भरा साथ दिया जैसे माँ पार्वती के प्रेम को शिवरात्रि में दिया । मेरे शिव ने अपना एक अंश मेरे हाथो में सौंप दिया और समय गवाह है आज तक कभी मुझे तिल भर भी कमी महसूस नहीं हुई अपने शिव में । रहमान के हम्मा हम्मा पर झूमते हुए सर और कन्धों को देखती हूँ तो डमरू के साथ नाचते नटराज दिखते हैं । गुस्से में जब उबलते देखती हूँ तो तीसरी आँख खुलने का वृतांत याद आता है । और भी किस्से हैं, कुल मिलाकर ऐसा लगता है तस्वीरों से निकल कर शिव मेरे लिए शरीर धरकर आ गए और मुझे अपना कैलाश बना लिया ।

भांग के नशे में कुछ ग़लत कह दिया हो तो माफ़ करना दोस्तों । आज दिल और कलम काबू में नहीं है मेरे । बुरा ना मानो, महाशिवरात्रि का त्यौहार है ।

हर हर महादेव ।

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