भगत सिंह की उम्मींदों की स्याही

कल गुरदास मान जी का नया म्यूजिक विडियो देखा । आधुनिक काल की विसंगतियों को संक्षिप्त तौर पे दर्शाते हुए बहुत ही ह्रदयस्पर्शी, मार्मिक और बेहतरीन विडियो बन पड़ा है । बहुत ही खूबसूरती से गुरदास मान जी ने राही मासूम रज़ा के ‘मैं समय हूँ’ को एक बार जादू की तरह इस्तेमाल किया और गुलामी के दौर में भगत सिंह के बचपन में जा पहुँचे । भगत सिंह को अपने साथ आधुनिक काल की सैर बहुत ही बढ़िया करायी गुदास मान जी ने । यूँ तो पूरा विडियो ही बहुत सुन्दर है लेकिन मेरा मन उनकी एक लाइन पर टिक गया ‘ वादा कर आगे की कहानी वेख के तू अपनी कहानी नहीं बदलेगा ‘। इस लाइन के साथ मेरे मन में सवाल उठने लगा कि ऐसा वादा करने को समय ने क्यूँ कहा भगत सिंह से ?

गुरदास मान जी का दर्द, उनका व्यथित ह्रदय और उनकी निराशा सब इस लाइन में उनके शब्दों से झांक रहे हैं । ऐसा लगता है जैसे आज के हालातों को देखकर वो पूरी तरह से अपनी उम्मींदे खो चुके हैं । कहीं ना कहीं उनके मन में यह ख्याल आता होगा कि अगर आज़ादी के मतवाले आज के भारत को देखते तो शायद अपनी शहादत से मुकर जाते । उन तमाम शहीदों ने, जिनमे कुछ जाने पहचाने और बहुत से गुमनाम हैं, जिस भारत का सपना देखा था वो आज की हकीक़त से कहीं तालमेल नहीं बैठा पाता है । ऐसे में शहीदों का अपनी शहादत के नतीजे पे शक़ करना या उससे मुकर जाना आज हमे बहुत ही जायज़ लगता है ।

मगर एक बार हम ख़ुद को उस समय में ले जायें जब गुलामी का दौर था, तो हमे उस गुलामी के खिलाफ लड़ने की वो तमाम वजहें जायज़ मालूम होंगी, जिनके तहत लाखो ने अपनी शहीदी दी । आने वाले कल के बारे में सोचकर हम उस समय अपने आस पास की विसंगतियों को कैसे नज़रंदाज़ कर पाते ? और आज़ादी के परवानों में दो खूबियाँ जो नायब थी वो थी ‘उम्मींद’ और ‘वक़्त से परे देखने की समझ’ । उमींद- अच्छे समय की, उम्मींद- उनकी शहादत की कामयाबी की । समझ इस बात की कि ‘समय कभी रुकता नहीं’, जैसे की गुरदास मान जी कहते हैं ‘वक़्त हर जगह हौंदा है’ । वक़्त 1930 में था, 2017 में है और 2117 में भी होगा । और हम आज नहीं जानते 2117 का भारत कैसा होगा । शायद वो आज के समय से बेहतर होगा ।

उम्मींद और हौसला ना छोड़ो मेरे दोस्तों, यूँ मायूस ना हो मेरे दोस्तों । हमारे शहीदों के लिए वक़्त ना उनकी शहादत के समय रुका था ना 2017 पर रुका है । वो देश को हमारे हवाले करके गए हैं दोस्तों । जो ग़लत हो गया उसे ठीक करने के लिए हौसला जुटाओ और उमींद जगाओ कि हम सब ठीक कर देंगे । आज के समय में अगर वो मुआयना करने आये देश का तो उन्हें ऐसे लोगों की भीड़ ना मिले जो उनपर दया कर रही हो या उनसे शर्मिंदा हो । चलो उन्हें ऐसी भीड़ से मिलाएं जिसे अपनी ग़लती का एहसास हो और वो उसे सुधारने की जुगत में लगी हो । हर एक में उन्हें अपना ही अक्स और अपना ही जुनून दिखाई दे । वो जो किसी से जाके पूछें कि ‘बेटा, जैसे हाल में तुम हो क्या इस हालत और देश को सुधार पाओगे?’ तो हर एक यह कहे ‘मैं अपनी कहानी आप लिख रयाँ और जब मैं ही लिख रहा हूँ तो उम्मींद की स्याही कम नहीं पड़ेगी और हौसलों की कलम हालत सुधारे बिना नहीं रुकेगी‘।

गुरदास मान जी ने विडियो के आख़िर में भगवान् को ही जिम्मा दिया है आज के हालात सुधारने का । मगर मैं कहती हूँ दोस्तों, अफ़सोस छोड़ो और तैयारी करो अगले पड़ाव की । अगर 2057 में कोई नया गुरदास मान भगत सिंह को लेकर समय में आये तो ऐसा दुखी, मायूस और शर्मिंदा ना हो । अपने जुनून की मुहर लगाकर भगत सिंह को एहसास करा दो कि वो बिल्कुल सही था जब उसने कहा था ‘भगत सिंह अपनी कहानी कभी नहीं बदल सकता’ क्यूंकि वो कहानी एक सच्ची और बेजोड़ कहानी है । जगदंबा प्रसाद मिश्र हितैषी  जी ने कहा था

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा’ ।

मिश्र जी के विचार और भावनाएँ बहुत उच्च रही होंगी जब उन्होंने यह लिखा था लेकिन दोस्तों अब वक़्त आ गया यह समझने का कि यह काफ़ी नहीं है । वतन पर मरनेवालों का बाकी निशां यह वतन है और इस निशाँ को वक़्त में खोने से बचाने के लिए आओ हाथ मिलाएं ।

इनक़लाब जिंदाबाद ।

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की

निदाघ से उमीद की बसंत के बयार की

मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी

अंगार से लगा चुका उमीद मैं तुषार की

कहां मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी

इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो! – हरिवंशराय बच्चन

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