जंगली फूल

इस बार अपनी बेटी को लेकर अपने गावं गयी तो पहाड़ी रास्तों पर ठंडी हवा और खिली हुई धूप के साथ चलना बहुत सुकून दे रहा था दिल को । पहाड़ो को काटकर बनायीं गयी कच्ची सड़के गवाही दे रही थी इंसान के हौसलों की और इंसानों से उनके बहुत पुराने रिश्तों की । यह वो रास्ते हैं जिन पर अभी भी पक्की कंकरीट नहीं बिछी है, केवल हर रोज़ आते जाते इंसानी क़दमों की थाप इन्हें जिन्दा रखती है । सड़क के एक तरफ पेड़ो से ढकी चट्टानें हैं तो दूसरी तरफ गहरी खाई, वो भी पेड़ो से पटी हुई । रास्ते में तरह तरह के फूल खिले रहते हैं जिन्हें देखकर कभी हमारे मन में सवाल नहीं आता मगर बाल-मन तो हर चीज में अपनी जिज्ञासा की छवि ढूंढ लेता है । मेरी बेटी ने एक फूल को देखा और कहा ‘कितना सुन्दर है!’ मैंने भी मुस्कुराकर हामी भरी, वो वाकई बहुत सुन्दर था । मेरी बेटी ने सवाल किया ‘माँ, यह कौन सा फूल है?‘ मैंने कहा ‘बेटा मुझे इसका नाम नहीं पता’ । तुरंत ही एक अगले मुस्कुराते फूल ने हमे देख लिया और प्यार भरा, खुशबूदार हेल्लो किया । मेरी बेटी ने उसकी तरफ प्यार से देखा और एक बार फिर मुझसे पूछा ‘माँ, यह कौन सा फूल है?‘ मैंने फिर वही कहा ‘बेटा मुझे इसका नाम नहीं पता’ । इस बार मुझे अपनी अज्ञानता पर थोड़ा सा शर्मिंदगी हुई । मेरी बेटी ने एक दो फूलों के बारे में और पूछा और वो अपने नतीजे पर पहुँच गयी कि माँ को कुछ नहीं पता ।

अब पापा की बारी आई । उसने एक प्यारे से सफ़ेद रंग के फूल को दिखाकर पापा से पूछा ‘ पापा, इस फूल का क्या नाम है ?‘ पापा ने देखा और कहा ‘हम्म, मुझे तो नहीं पता’ । इसके पहले की बेटी पापा से मायूस हो जाये पापा ने अपनी एक कोशिश की और कहा ‘रुको यहीं, मैं इंटरनेट खोलता हूँ, शायद वहाँ इसकी कोई फोटो दिख जाये ।‘ बेटी ने पापा की बुद्धिमानी और रेसौर्सफुलनेस पर पापा को एक kiss दी । दोनों मोबाइल में घुस गए और कुछ देर की जद्दोजहद के बाद उससे बाहर निकले । मुझे लगा इतने गहरे पानी में दोनों घुसे थे, मोती तो ज़रूर हाथ लगा होगा । मैंने पूछा ‘क्या पता चला?’ मेरी बेटी बोली ‘माँ, किसी को भी नहीं पता कि इस फूल का नाम क्या है ?’ मैंने मन ही मन सोचा चलो हम दोनों पति पत्नी का डोला हुआ सिंहासन कुछ तो स्थिर हुआ । कुछ दूरी पर एक बहुत ही सुन्दर सुर्ख लाल रंग का फूल दिखा और उसने मेरी तरफ देखकर कहा ‘माँ, तुम्हें यह फूल कैसा लग रहा है ?’ मैंने कहा ’बहुत ही सुन्दर’ । फिर वही सवाल पापा से किया उसने और पापा ने भी कहा ‘बहुत ही अच्छा’ । मेरी बेटी ने हम दोनों से अगला सवाल किया ‘ क्या यह सबको अच्छा लगता होगा?’ हम दोनों ने कहा ‘ हाँ, शायद’ । बाल-मन का कौतुक और उसके सवाल दोनों का कोई किनारा नहीं होता । यह एक ऐसा अथाह सागर है जिसमे बिना हिचकोले खाए किसी भी माँ-बाप की नैया पार नहीं लगती ।

अब हमारा समय आ गया था तूफानी भवंर का सामना करने का और ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ कि मेरी बेटी का अगला सवाल कुछ ऐसा ही इशारा कर रहा था । उसने पूछा ‘ माँ, किसी को इसका नाम क्यूँ नहीं पता है ?’ मैंने संभलते हुए कहा ‘बेटा, बचपन में माँ ने बताया था कि इसको जंगली फूल कहते हैं ‘। ‘जंगली!!! जंगली, यह कैसा नाम है ?’ उसने बुरा सा मुहँ बनाकर पूछा । मैंने कुछ नहीं कहा तो वो मेरी तरफ़ ऐसे देखती रही जैसे उसे उत्तर में शब्द ही चाहिए ख़ामोशी नहीं । मैंने फिर थोड़ा जोर लगाया और कहा ‘ बेटा, इनको जंगली इसलिए कहते हैं क्यूंकि यह बिना किसी देखभाल के ही उग जाते हैं । ना कोई इन्हें पानी देता है, ना कोई खाद देता है और ना कोई इनके बीज बोता है’। मेरी बेटी ने तपाक से कहा ‘ना कोई इनकी फोटो खींचता है’ । ठंडी हवा में ना जाने क्यूँ मुझे सिसकियों सी आवाजें आने लगी । जल्दी से पलट कर पास के जंगली फूल को देखा तो वो अब भी मुस्कुरा रहा था । मेरी बेटी ने अगला सवाल किया ‘माँ, क्या यहाँ के लोग एक दूसरे को यही फूल देते हैं ?‘ मेरी बेटी ने देखा है कि हम लोग शादी में या किसी फंक्शन में गुलदस्ता देते हैं दूसरों को और उसका सवाल इसी सिलसिले में था । मैंने कहा, ‘नहीं बेटा , मैंने तो कभी ऐसा नहीं देखा‘। मेरी बेटी ने बड़ी हमदर्दी से फूल को देखा और कहा ‘ तो यह फूल किसी काम नहीं आता?’ तुरंत ही अगला सवाल दागा ‘तो फिर यह उगता क्यूँ है ?’

यह सवाल मेरे अन्दर एक नश्तर की तरह चुभ गया और मैं बहुत देर तक उस फूल को देखती रही । मन ही मन सोच रही थी ‘ ना प्रेमियों को इसकी चाह है, ना देवताओं के चरणों में इसकी जगह है, किसी ने इसके नामकरण की भी नहीं सोची, किसी ने इसके देखभाल का जिम्मा भी नहीं लिया और यह कैसी ज़िद है इन फूलों की, कि बचपन से आजतक हर बार मैंने इन्हें इन रास्तों पे खिले हुए, मुस्कुराते हुए पाया है? क्यूँ यह लोगों की उपेक्षा से अपनी हिम्मत नहीं खोते? दुनिया में अपने होने का डंका पीटे बिना कैसे हर बरस हो जाते हैं, बस होने के लिए?’ मन में इन ख्यालों के तूफ़ान घूम ही रहे थे कि स्कूल से लौटते हुए दो बच्चे बातें करते हुए हमारे पास तक आ पहुँचे और उस फूल को छूकर आगे बढ़ चले । फूल और तेज़ी से हिल हिलकर झूम रहा था जैसे खिलखिला रहा हो । तभी सर पर घास का ढेर लिए एक औरत गुजरी और उसके साथ उसकी सहेली भी थी सर पर लकड़ी का ढेर लिए । वो दोनों वहाँ रुकी और उनमे से एक ने कहा ‘ आज घर लीपना है, तो द्वार पर रखने के लिए फूल ले लेती हूँ’ । उसने एक गुच्छा फूलों का तोड़ लिया और फूल मुस्कुराते हुए उसके साथ चल दिये उसके घर द्वार को महकाने । उनकी देखा देखी मेरी बेटी ने भी एक फूल तोड़ लिया और उसे प्यार से देखती हुई वो आगे चल पड़ी । इतनी देर में ट्रैकिंग की थकान शायद कम हो गयी थी या नए दोस्त को पाकर सफ़र फिर से शुरू करने का जोश था । हम तीनो चल पड़े । पहाड़ो में थोड़ी थोड़ी दूर पर छोटे छोटे मंदिर बने होते हैं, बहुत ही सादगी से बने हुए मंदिर । ऐसा ही एक मंदिर हमारे अगले मोड़ पर था । पहाड़ो की एक बड़ी खूबी यह भी होती है कि घुमावदार रास्ते अगले कई मोड़ो की झलक देते जाते हैं या यह कहिये आने वाली फ़िल्म का ट्रेलर मिलता रहता है आपको । सचमुच, पहाड़ो पर चलना बहुत ही मनोरंजक और आनंदमयी होता है । जैसे ही मेरी बेटी ने मंदिर देखा वो फूल लेकर अन्दर गयी और जाते हुए पूछती गयी ‘माँ, इस फूल को भगवान् जी को चढ़ा सकते हैं?’ मैंने हाँ में जवाब दिया । वो हँसते हुए बाहर खाली हाथ लौटी ।

इतनी देर में मुझे कुछ जवाब मिल गए थे । वो फूल है क्यूंकि उसको होना पसंद है, किसी की चाह में उसने अपने अस्तित्व को नहीं बांधा है । किसी के ना चाहने से उसके होने (existence) की ख़ुशी कम नहीं होती । वो हर बरस उग जाता है कुछ स्कूल के बच्चों से हाथ मिलाने को । किसी के कच्चे घर से गोबर की महक को हटाकर अपनी खुशबू से महकाने को । मेरे जैसे साल में एक बार आने वाले अपने दोस्त को अपनी माँ से की हुई कुछ बातें याद दिलाने को । मेरी बेटी की तरह आये नए मेहमानों को अपने होने का मीठा खुशबूदार एहसास दिलाने को । मेरे पति जैसे इंटरनेट प्रेमियों के मोबाइल पे अपनी सुन्दर फोटो दे जाने को । वो हर साल उगता है बताने को कि मैं दुनियादारी से बहुत दूर अपनी ही मस्ती में मस्त रहता हूँ । हर साल उगता हूँ, फूलता हूँ और झड़ जाता हूँ । जीवन दूसरों की नाप तौल और दूसरों के प्रमाणों से कहीं आगे होता है, यह जताने को वो जंगली फूल हर साल उग जाता है । जिंदगी को सलाम करने वो हर साल उग जाता है ।

🙂

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