हॉस्टल और कॉलेज वाला वैलेंटाइन डे

एक ज़माना ऐसा भी था जब कोई हमारा दिल और हम उसके दिल की धड़कन हुआ करते थे मगर सबको जताना भी था कि हम इन इश्क़ के लफ़ड़ो में नहीं पड़ते । क्या कूल हैं हम ! किसी के पीछे भागते नहीं, रातों को चैन से चादर तानकर सोते हैं, अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, जो चाहे सो करते हैं । सबसे हंस कर मिलते हैं और किसी को जवाब भी नहीं देना कि उसके साथ इतना क्यूँ हंस रही थी । एकदम बिंदास, बेबाक ज़िंदगी- ना इश्क़ का मीठा सा दर्द, ना उल्फ़त के जाम, ना किसी के दीदार की तलब, ना लब पे सर्द आह, ना जुदाई के आँसू, ना उसको खो देने की दहशत और ना किसी से जलन । यह हमारा चेहरा और मिज़ाज़ हुआ करता था जो हम दिन भर ओढ़े रहते थे और रात होते ही दिये की तरह जलने लगते थे किसी की यादों में बेकरार ।

एक बुत बनाऊँगा तेरा और पूजा करूँगा,

रंग वफ़ा का मैं तेरी मूरत में भरूँगा ।

मर जाऊँगा प्यार अगर मैं दूजा करूँगा ।।

खैर रात की बात तो ख़ुफ़िया थी जिसकी किसी को कोई भनक भी नहीं थी । दिन में भरपूर रौला दिखाते थे हम अल्हड़ मिज़ाज़ का । एक बहुत अच्छी दोस्त थी मेरी जिससे तकरीबन सभी तरह की  बातें मैं कह लेती थी सिवाय अपने इस राज़ के । उसका भी हॉस्टल में ऐसा कोई ताना-बना नहीं चल रहा था तो हम दोनों में खूब छनती थी । बेकार, बेफिज़ूल की बातों पे हंसी ठट्ठा करना और अपने आपस में इश्क़ के बीमारों का मज़ाक बनाना, यह हमारे पसंदीदा कामों में से एक था ।

हम दोनों की दोस्ती काफ़ी गहरी थी, हम एकदूसरे के दोस्त कम और बहने ज्यादा लगते थे । जब कभी वो किसी बात से उदास हो तो हॉस्टल के पास एक ढाबे पे मैं उसे जीरा राइस विद दाल फ्राई खिलाने ले जाती थी । शायद उस ढाबे पे खाने का स्वाद था या साथ में गम ग़लत करने की कोशिश कि उसके बाद वो खुश हो जाती थी । जब कभी मुझे परेशान करना हो तो वो मुझे पास के आइस-क्रीम पार्लर ले जाती थी और गुलाब, अंजीर और भी ना जाने कौन कौन से फ्लेवर की आइस-क्रीम खिलाती थी । उसका कहना था कि एक ना एक दिन वो मुझे आइस-क्रीम से प्यार करना सिखा ही देगी । लगातार दो साल उसके जुल्म को सहने के बाद मैंने एक दिन कहा ‘आय लव बटर स्कॉच’ और उसके चेहरे की चमक देखने वाली थी । जीत की ख़ुशी में चाल ही बदल गई थी उसकी और हम फिर पहुँचे ढाबे लेकिन इस बार उसकी जीत का जश्न मनाने । कहने का मतलब हम दोनों की अपनी ही दुनिया थी हॉस्टल में और हम उसमे बहुत ही खुश थे ।

यूँ तो हॉस्टल में हर दिन वैलेंटाइन डे और हर रात करवाचौथ की रात होती थी, मगर फिर भी वैलेंटाइन डे कुछ निराला होता था । हॉस्टल में एक दंगल तो पक्का ही था – एक तुनक मिज़ाज़ लड़की थी । उसकी अक्सर अपने बॉयफ्रेंड से झड़प होती थी और फिर वो लड़का जिस तरह हॉस्टल गेट के बाहर धरना देकर बैठ जाता था वो वाक़ई बहुत ही मज़ेदार होता था । जिनके बीच झगड़ा होना दाल-चावल वाली बात हो उन्हें वैलेंटाइन वाले दिन भी पिज़्ज़ा हज़म नही होता बिना अपना दाल-चावल राउंड पूरा किये । तो भई हो गया दंगा । लड़का सुन्दर गुलदस्ता लिए गेट से बार-बार उसकी कॉल लगवा रहा था और वो आ ही नहीं रही थी । लड़के ने लगभग घंटे भर बाद एक ग्रीटिंग कार्ड किसी दूसरी लड़की के हाथो अन्दर भिजवाया और जवाब में वो फटा हुआ उसे वापस कर गयी । कुछ देर बाद उसने बड़ा सा चॉकलेट पैकेट अन्दर भिजवाया गेट से अन्दर जाती हुई किसी और लड़की से । वो वापस नहीं आया । कह नहीं सकती कि उसका क्या हुआ ? किसने खा लिया ? खैर फिर कुछ देर बाद उसने गुलदस्ता भी अन्दर भिजवा दिया और वो लड़की फनफनाती हुई आई और गुलदस्ता उसके मुहँ पे मार कर चली गयी । हम दोनों के साथ वहाँ और भी ‘फ्री’ लड़कियाँ इस तमाशे का मज़ा ले रही थी । मगर अब तो हम सबको उस लड़के पे रहम आने लगा था और एक लड़की ने तो भला बुरा भी कहना शुरू कर दिया था । उस लड़के ने उम्मींद भरी नज़रों से हमारी तरफ देखा और कहा एक हेल्प चाहिए । एक रहमदिल लड़की उसके पास गयी और पूछा कि क्या हेल्प चाहिए । उसने कहा एक पेपर और पेन मिलेगा । मैंने कहा लो अभी ड्रामा और बचा है और हम दोनों ने अपनी दबी-दबी सी हंसी को और दबाया । भई लड़के को पेन मिला और उसने लव लैटर लिखकर अन्दर भेजा । इतनी मिन्नतों के बाद, लगभग २ घंटे के ड्रामे के बाद वो लड़की पिघली और बाइक पे बैठकर उसके साथ पिज़्ज़ा खाने चल दी । हम दोनों खूब खिलखिलाकर हँसे कि क्या नौटंकी है !

इधर हॉस्टल में ऐसा था तो कॉलेज भी कहाँ अछूता था । लड़को की चाल में मस्ती घुली हुई थी और लड़कियों के हाथों में तोहफे सजे हुए थे । आ हा हा ! क्या समा था ! क्या उम्र थी ! क्या ज़माना था !

कॉलेज कैंपस में इश्क़ और हुस्न का जलसा था ।

कोई कुछ बोले ना बोले सब सुना सुना सा था ।।

मेरी दोस्त थोड़ा बहक गयी ऐसे नजारों में और बोली ‘यार, काश! कोई अपन को भी रोज़ देता । अपन भी कुछ हैप्पी मैमोरी बनाते ।‘ मैंने उस समय पहली बार महसूस किया कि वो उम्र ही कुछ ऐसी होती है कि हर कोई किसी का प्यार चाहता है और किसी ना किसी को प्यार करना चाहता है । मेरे दिमाग में यह ख्याल नहीं आया क्यूंकि मेरा दिल-दिमाग पहले ही किसी के प्यार में पागल था । भले ही वो मुझसे तीन-चार महीनो की दूरी पर हो, पर कोई है जो मुझे यह कमी महसूस नहीं होने देता । तो मेरी जिंदगी में यह कमी नहीं थी और मुझे एक हल्का सा दर्द महसूस हुआ अपनी दोस्त के लिए । मैंने एक लाल गुलाब कॉलेज गेट के पास से खरीदा । उसको दिया और कहा ‘आय लव यू’ । वो खिलखिला खिलखिलाकर हंसी और फिर उसने भी एक लाल गुलाब मुझे देते हुए अपने प्यार का इकरार किया । हम दोनों हँसते हुए गुलाब और एक दूसरे का हाथ पकड़े कॉलेज कैंटीन तक आ चुके थे । उसने कहा ‘चल चाय, पोहा लेते हैं ‘। हम दोनों पहुँचे और आर्डर दे दिया २ कटिंग चाय और एक पोहा । छोटू एक काँच के ग्लास में चाय लाया और एक खाली ग्लास लाया । पोहा हमारे बीच रखा और चाय दोनों ग्लास में आधी आधी रखकर चला गया । उसने ग्लास उठाया और पीने को हुई तो मैंने कहा ‘रुक जा, उसका काँच ऊपर से गरम है । दूसरा ग्लास ले ले । इसे मैं ले लेती हूँ ।‘ उसने दूसरा ग्लास लिया और अपने आँखों की नमी छुपाने की कोशिश की । कुछ देर बाद बोली तू सच में मुझसे प्यार करती है । क्या कहूं , काम तो मैंने कई बार और भी बड़े-बड़े किये थे मगर शायद वैलेंटाइन डे के मौसम का असर था कि उसको एहसास इतनी छोटी सी बात पे हुआ ।

आज इश्क़ के इस मौसम में तुम्हारी यादें और गुलाब दोनों ही मुझे महका रही हैं । एक बार फिर से तुम्हारे साथ पोहा खाने और चाय पीने की इच्छा हो रही है, मेरी वैलेंटाइन डे स्पेशल दोस्त ।

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