एक दिन जो यादगार बन गया

वैसे तो हर वो बात और एहसास जिसके साथ ‘पहला’ शब्द जुड़ जाये अपने आप में यादगार और अनोखा होता है । पहली मुलाक़ात, पहली मुस्कान, पहला इंटरव्यू, पहली नौकरी, पहली कमाई, पहली दोस्ती, पहली जुदाई और पहला प्यार । दुनिया में कोई नहीं है और कुछ नहीं है इनका मुकाबला करने को- यह सब बेमिसाल हैं । चलिए आज पहले वैलेंटाइन्स डे का क़िस्सा सुनते हैं । क़िस्सा कुछ ऐसा है –

अपने MCA के पांचवे सेम्सेटर में हम दोनों एक-एक नौकरी अपनी झोली में डाल चुके थे । कहने का मतलब यह है कि ख़ुद को साबित करना, माता-पिता की उम्मीदों पे खरा उतरना जैसी सारी चिंताओं से हम आज़ाद थे । मस्त पंछी बनकर, यह डैने फैलाये ऊँची उड़ान भर रहे थे । सब कुछ बहुत ही सही लग रहा था या यह कहूं कि दुनिया में कहीं कुछ ग़लत नहीं लग रहा था । पाँचवे सेमेस्टर में जब नौकरी लगी तो एक पुराने दोस्त ने शादी का प्रपोजल भी सामने रख दिया था । हमारी पाँचो उंगलियाँ घी में और सर कढाई में था । दोस्त ने शादी के लिए प्रोपोज़ कुछ ऐसे किया था कि वो अपनी बेस्ट फ्रेंड को खोना नहीं चाहता और शादी ही एक तरीका है हिन्दुस्तानी समाज में दोस्ती जिंदगीभर बनाये रखने का । प्यार जैसी किसी बात का कोई ज़िक्र ही नहीं था । हम बड़ी अजीब सी हालत में थे कि ‘यार, यह क्या बात हुई’ । माना कि हम दीपिका पादुकोण नहीं हैं, तो क्या वो हमारे लिए नहीं गायेगा-

‘तेरे लिए ही तो सिग्नल तोड़ ताड़ के, आया अपनी सारी बैचमेट छोड़ छाड़ के ‘।

माना कि लड़कियों वाली अदाएं हमने कभी दिखाई नहीं, माना कि हम बहुत ही इंटेलीजेंट समझे जाते थे, मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि शादी का प्रपोजल भी इंटेलीजेंट तरीके से होगा – नो प्यार श्यार। कोफ़्त तो बहुत हुई, मगर ना नहीं कर सके क्यूंकि हम भी दिल ही दिल में उस दोस्त को बहुत चाहते थे । प्रोपोज़ करके उसने हमारी ज़िंदगी बना दी थी । मगर कोफ़्त के बदले कोफ़्त देनी तो बनती थी। तो भई हमने भी नहीं बताया कि हम तुमसे प्यार करते हैं और नहीं बताया कि कब से तुम्हारे बारे में सोच कर रातों को हॉस्टल की छत में आँखों से छेद कर रहे हैं । और कहा कि ठीक है अभी तो हम किसी से प्यार नहीं करते लेकिन अगर किसी से प्यार हो गया तो इस हां को ना समझ लेना । इस तरह हम दोनों लड़ाकू विमानों ने एक दूसरे पे बम गिरते हुए अपने आगे की उड़ान जारी रखी ।

हम मुंबई में थे और हमारी MCA के आख़िरी सेम्सेटर की ट्रेनिंग चल रही थी, TCS में । वो दिल्ली में था और अपने आख़िरी सेमेस्टर की ट्रेनिंग कर रहा था । रोज़ हम दोनों एक दूसरे को मेल करते थे और अपनी-अपनी ट्रेनिंग और अपने मेंटोर्स की कहानी एक दूसरे को लिखते थे । कभी मौसम का हाल चाल और कभी नए बने दोस्तों की खबरें एक दूसरे को देते थे । यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि हम दोनों ने अपने न्यूज़ चैंनल खोल रखे थे एक दूसरे ले लिए । प्यार का जिक्र कभी किसी तरफ से नहीं होता था । ट्रेनिंग में stipend इतना मिलता था जो नए शहर में किराये और खान-पान की ज़रूरत ही पूरी कर सकता था । ऐसे में आया वैलेंटाइन्स डे । बचपन से ही यह मेरे लिए बेमतलब का दिन था और काफ़ी हद तक दूसरों की लवलाइफ के मज़े लेने का दिन हुआ करता था । तो इस बार भी क्या अलग होना था ? एक दोस्त से प्यार हुआ और बात शादी तक भी पहुँच गई पर प्यार का जिक्र गायब ही रहा ।

मैंने कुछ सोचा नहीं था और ना ही सुबह से हम दोनों ने एक दूसरे को ऐसा कुछ विश किया था । रात को खा पीकर सोने को हुए तो फ़ोन की घंटी बजी, दिल्ली का नंबर । ओहो ! उसकी आवाज़ सुनने के ख्याल से ही मन बावला हो गया , नींद ने हिरनी सी छलाँग लगायी और अँधेरे में कहीं गुम हो गयी । हमने बहुत ख़ुशी से फ़ोन पे हेल्लो बोला और जवाब में उसकी आवाज़ सुनके निहाल हो गए । तभी मन में ख्याल आया – लो जी, अब तो वैलेंटाइन्स डे हमारे लिए भी हैप्पी वैलेंटाइन्स डे हो गया । उसको नहीं कहा , सोचा कहीं घुड़क ना दे कि मुंबई जाकर फ़िल्मी हो गयी हो । मन में चल रहे इस सेकंड ट्रैक को अचानक ब्रेक लगा जब उसने कहा ‘आई लव यू’ । उसके शब्द धीरे धीरे मेरे पूरे शरीर , मेरे रोम रोम में सिहरन दे गए । एक ठंड का एहसास बाहर से हो रहा था और एक आग का एहसास अपने भीतर से । पता नहीं कि ठण्ड से बचने के लिए दिल में आग जल रही थी या अन्दर की आग से बचने के लिए शरीर ठण्ड पैदा कर रहा था । लेकिन यह बात तय है कि वो मकाम था मेरे लिए दो अलग और एक दूसरे से बिल्कुल उलट एहसासों को पूरी बारीकी से महसूस करने का । उन कुछ पलों में मैंने जितना जी लिया और मर लिया वो शायद हद्द है मेरे एहसासों की ।

आज मदहोश हुआ जाये रे मेरा मन मेरा मन मेरा मन ।

एक मुस्कान खींच गयी चेहरे पर, जो समेटे नहीं सिमट रही थी और फ़िसली जा रही थी मखमल की तरह । ना जाने उसने और क्या कहा होगा पर मैंने आगे कुछ सुना ही नहीं । इंतज़ार इस तरह अचानक मुक्कम्मल हो जायेगा कभी सोचा ही ना था । और जब ऐसी ख़ुशी मिलेगी तो अपने दामन में उसे कैसे सम्भालूंगी इसकी कोई रिहर्सल भी नहीं की थी मैंने । मैं मुस्कुराती हुई डूबती ही चली जा रही थी उस सैलाब में कि फिर एक ब्रेक लगा । दिल्ली से गुज़ारिश आई कि मैं भी जवाब में यही बोलूँ । हाय ! अगर जमीं फट सकती तो उस समय मैं शर्म से उसमे घुस जाती । कैसे बोलूँ ? इतने आसान से शब्द मुहँ में फस गए थे और शर्म से चेहरा लाल भट्टी बन रहा था । मैंने मना कर दिया कि मैं नहीं बोलूँगी, जब मैं प्यार करती नहीं तो क्यूँ बोलूँ । मगर वो नहीं माना, बोला- फिर भी बोलो, मेरे लिए, एक बार बोलो । जितना वो जिद्द करता गया उतना ही मेरी शर्म बढ़ती गयी और आख़िरकार लाल भट्टी से जले हुए शब्द जल्दी से उगले मैंने, शायद शताब्दी की रफ़्तार से । और बोलने के बाद उतनी ही तेज़ी से कहा बाय । उसने बाय नहीं किया और कहा ‘अच्छे से बोलो, प्लीज । जब तक तुम ठीक से नहीं बोलोगी मैं फ़ोन नहीं रखूंगा’ । एक तरफ मैं शर्म से घिसी और पिघली जा रही थी और दूसरी तरफ उसकी जिद्द और STD के बिल का ख्याल । उफ्फ ! कहाँ फ़स गयी ?

कभी हमने नही सोचा था ऐसा दिन भी आयेगा

पानी में आग लगेगी, पत्थर भी पिघल जायेगा

फिर दो तीन चार पांच और भी ना जाने कितने टेक के बाद मेरा सीन ओके हुआ । और उसने खिलखिलाते हुए फ़ोन रख दिया । ऐसा लगा कि उसने मेरे सारे पर्दों के भीतर घुसके देख लिया है मुझे । कितना छुपाया और आज इस तरह क़ुबूल करना पड़ा कि प्यार करती हूँ तुमसे । मैं उसकी आवाज़ की गूँज और खिलखिलाहट के साथ अकेली खड़ी रही और मुस्कुराती रही, शर्माती रही । घंटे जो पलों में बीत गए । रात जो एक फ़ोन कॉल में बीत गयी । उस रात को खुलासा हुआ कि क्यूँ उसने शादी के लिए पूछा । क्यूँ सच नहीं बोल सका ? शायद मेरी तरह डरता था कि सच बोलके दोस्त ही ना खो बैठे । मगर इस वैलेंटाइन्स डे ने उसे हिम्मत दिला ही दी अपना दिल खोलने की और सच बोलने की ।

बचपन से सोचती थी क्या बेकार के दिन ईजाद कर रखे हैं अंग्रजों ने । मगर उस दिन उनकी बुद्धिमानी पे एक बार फिर से उनका गुलाम बनने ही हसरत हो उठी । हा हा हा  ।

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