खोया – पाया

जब से मैंने ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा है तब से इस दुनिया के एक रिवाज़ ने मुझे हर बार हैरान किया है । और वह रिवाज़ है – रोते बिलखते या नाग की तरह फुफकारते ब्लोग्स की पॉपुलैरिटी, जनप्रियता या मक़बूलियत । इस तरह के ब्लोग्स एक बहुत बड़े हुजूम को अपनी तरफ खींचते हैं । अगर आप ऐसे ब्लोग्स के कमेंट्स पढ़े तो आप हैरत करेंगे कि लोग कैसे दिली तौर पर जुड़ाव महसूस करते हैं ऐसे ब्लॉग और ब्लॉगर से ।

एक बहुत ही ख़ास बात यह भी है कि यदि कोई उस दुःख के पार देखने का या उस दुःख से बाहर आने का कोई मशविरा दे, तो पूरा हुजूम ऐसे मायूस हो जाता है जैसे किसी ने उनका बहुत ही अज़ीज़ एहसास छीन लेने की कोशिश की हो । ऐसी नादानी मैंने की है और नादानी इसलिए कहूँगी कि मुझे समझ नहीं आता कि कोई अपने दुःख का हल क्यूँ नहीं चाहता ? कोई क्यूँ अपने गुस्से को क़ाबू कर सही दिशा नहीं देना चाहता ?

पहले नादानी की इन्तेहा थी कि कोशिश नहीं छोड़ते थे- लोगों को हंसाने की और उन्हें उनके दुःख और गुस्से के गुबार से बाहर निकालने की । बहुत लम्बा समय लगा यह मानने में कि सचमुच कोई चाहता ही नहीं है उन हालातों से बाहर निकलना । जब यह मान लिया तो यह जानने का मन हुआ कि क्यूँ नहीं ?

कुछ बातें आपसे बाँटती हूँ जो मुझे समझ आई इस रिवाज़ की ।

पहली बात कि दुःख, गुस्सा और दया यह दिल को बहुत ही गहराई से महसूस होते हैं । ख़ुशी हर बार इतने गहरे उतर नहीं पाती ।

दूसरी बात कि हम दूसरों की ख़ुशी से खुश कम हो पाते हैं और अक्सर ही हम या तो जलन महसूस करते हैं या फिर शक़ कि लिखने वाला झूठ लिख रहा है ।

तीसरी बात कि हम सभी ऐसे रंग-ढंग में जीने लगे हैं कि हम दुनियादारी और दुनिया भर की चीज़ों के पीछे भागते रहते हैं । कुछ चीज़ें हासिल होती हैं मगर अक्सर हमारे पास एक लम्बी लिस्ट होती है हमारी नाकमियाबी की । नाकमियाबी- हासिल ना कर पाने की, नाकमियाबी- दूसरों से होड़ में पिछड़ जाने की ।

यह एहसास दिन रात दिल में चुभते रहते हैं और लगातार एक बेचैनी, एक दर्द और एक गुस्सा दिल में बना ही रहता है । तो हम दर्द से यूँही दिन रात जुड़े हुए हैं । खुशियाँ तो कभी-कभी इस घनी छाँव से रिसकर थोड़ी बहुत हम तक पहुँच पाती हैं । ऐसे में दुःख को एक झलक में पहचान लेना और ख़ुशी पे शक़ करना बहुत ही लाज़मी है । और ख़ुशी को पहचान कर उससे जलन करना भी कोई बड़ी बात नहीं है ।

लोग किसी को दुखी देखते हैं तो तुरंत ही अपने किसी दुःख से उसे मैप कर लेते हैं और एक रिश्ता बन जाता है दोनों के बीच – आँसुओं का रिश्ता ।

लोग किसी को गुस्से में चिल्लाते सुनते हैं तो उनके भीतर का गुस्सा फूट पड़ता है और एक रिश्ता बन जाता है दोनों के बीच – शिकायतों का रिश्ता ।

ऐसे में कोई बेवकूफ़ आकर कह दे दुखी ना हो, शिक़ायत ना कर, ज़रा नज़र घुमा कर देख अभी भी तेरे पास बहुत कुछ है सहेजने को और करने को..तो उसका हाल कैसा होता है यह मुझे अच्छी तरह पता है ।

चौथी बात कि लोगों में मायूसी भर गयी है । कहीं ना कहीं वो अन्दर से टूट चुके हैं और हार मान चुके हैं अपने हालातों से । हारा हुआ इंसान रोने और गुस्सा करने के सिवा और किस तरह अपनी हार से समझौता कर सकता है ?

तो मैंने जाना कि क्यूँ रोने पीटने और गुस्सैल ब्लॉग लोगों का एक मेला अपने साथ ले पाते हैं । ब्लॉगर हूँ, तो एक मेला साथ मेरे चले यह गुनाहग़ार ख्वाहिश मुझे भी कभी-कभी होती है । और सोचती हूँ एक रोता बिलखता ब्लॉग लिख दूँ और बस दे लाइक्स पे लाइक्स और कमेंट्स पे कमेंट्स । लेकिन इतना सोचकर ही मेरी इच्छा पूरी सी हो जाती है क्यूंकि जब सोचती हूँ कि दूसरों को रुलाने से पहले ख़ुद भी रोना होगा तो मन कह देता है ‘चल फुट यहाँ से’ ।

मेरे जीवन को मैंने बहुत कोशिशों से इस होड़ और चीज़ों को हासिल करने के नज़रिए से दूर रखा है । यह सुकून जो मेरे जीवन में है, उसे मैं किसी भी कीमत पर गँवाना नहीं चाहती । मैं लोगों में खुशियाँ बाँटना चाहती हूँ और समझती हूँ कि जब मन खुश होता है तो अपने दुखों और मुश्किलों से जूझने का जोश उसमे ख़ुद ही भर जाता है । उसे किसी के कंधे की ज़रूरत नहीं होती आँसू बहाने को और ना ही उसके पास समय होता है इन बातों पर खर्च करने को । मैं चाहती हूँ कि मेरी दुनिया, जिसमे मैं, मेरा परिवार, मेरे दोस्त और मेरे जाननेवाले आते हैं, वो खुश रहे, उम्मींद पे जिए, सपने देखे, खूबसूरती देखे और मस्त बिंदास दिल खोलकर हँसे । यह इच्छा मुझे ब्लॉगिंग के रिवाज़ को दूर से सलाम करने का ज़ज्बा देती है ।

जब तक जिन्दा हूँ तब तक मेरे पैर मेरा भार उठा लेंगे कंधे तो मुर्दों की ज़रूरत होते हैं ।

सलाम जिंदगी और सलाम जिन्दादिली ।

🙂

 

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