पेरेंटिंग ज्ञान

अक्सर पढ़ने में आता है कि माँ-पापा बच्चे के आदर्श होते हैं । बच्चे उनके आचरण से सीखते हैं ना कि उनके मुहँ से निकले ज्ञान वचनों से । मैं एक छः वर्षीया कन्या की माँ हूँ और अपने अनुभव से आपको सचेत करना चाहती हूँ कि इन बातों में कदापि ना आयें । इन बातों के चक्कर में मैंने अपने जीवन में बड़े हेर-फेर किये मगर नतीजा ठन-ठन गोपाल ।

मैं बहुत फैशनेबुल कभी नहीं रही मगर लिपस्टिक लगाने का मुझे बहुत शौक था । जानते बूझते हुए कि यह रासायनिक चीज़ें हमे नुकसान पहुँचाती हैं मैं इसका इस्तेमाल घर से निकलते समय कर ही लेती थी । जब मैंने मातृत्व की दहलीज़ पर क़दम रखा तो मेरी बहुत ही प्यारी सी बेटी ने अपनी खुली बाँहों से और अपनी नन्ही सी किलकारियों से मेरा स्वागत किया । सारे नवीन, आधुनिक पेरेंटिंग ज्ञान ग्रंथ के साथ अपनी बेटी को अच्छी से अच्छी  परवरिश देने के मंसूबे से हमने गृहप्रवेश किया । ग्रंथ, जिनमे सुझाव थे कि पहले माँ-पापा को वो बदलाव बनना होगा जो वो अपने बच्चे में चाहते हैं क्यूंकि उनका आचरण ही उनके बच्चे का पहला गुरू होता है । जब मेरी गोद में मेरी बेटी आयी और मैंने उसके फूलों से भी नाज़ुक गुलाबी होंठ देखे तो मैंने उसके लिए ख़ुद को बदलने की भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली । एक माँ ने उस दिन तय किया कि अब वो लिपस्टिक नहीं लगाएगी वर्ना बेटी के प्यारे नाज़ुक होंठो को कैसे बचाएगी ! बेटी के लिए आदर्श बनना है कि नहीं ? बेटी के सामने सभी कॉस्मेटिक चीज़ों को बुरा साबित करने के लिए मैंने कमर कस ली थी । मैं सर्दियों की कोल्ड क्रीम और गर्मियों की सन्सक्रीन के अलवा सभी कॉस्मेटिक चीज़ों को घर के बाहर कर चुकी थी । माथे पे बिना किसी शिकन के मैंने ‘झल्ली’ का उपनाम भी अपना लिया था । मेरे भाई की शादी में मैंने सिर्फ़ लिपस्टिक लगाने का कीर्तिमान भी बनाया । बेटी के लिए आदर्श बनने की ललक में मैंने अविचल भाव से अपना यह जोगन रूप बनाये रखा । मगर यह क्या ! मेरी बेटी ने अपनी क्लास टीचर को इस मामले में अपना आदर्श बना लिया ! हर रोज़ उनकी लिपस्टिक की तारीफ़, उनके आई-लाइनर और आई-शैडो के किस्से । कहाँ हैं वो सब ज्ञानी जो कहते हैं कि माँ-पापा और घर बच्चे का पहला गुरू और गुरुकुल है ? मेरी छः साल की बेटी अपने नाजुक होंठो पर लिपस्टिक लगाना चाहती है और आँखों को भी ड्रेस के मुताबिक रंगना चाहती है ।

क्या से क्या हो गए बेवफ़ा तेरे प्यार में,

चाहा क्या ? क्या मिला बेवफ़ा तेरे प्यार में ।

मैं समाज में महिलाओं के वस्तु-करण (objectification) से खासा चिड्ती हूँ । मुझे महिलाओं की भी प्रवृति कभी-कभी समझ नहीं आती । समय और माहौल के हिसाब से कपड़े पहनने में महिला सशक्तिकरण को आघात कैसे पहुंचता है यह मेरे लिए समझना बहुत मुश्किल है । दिल्ली की इस ठण्ड में लडकियाँ छोटे-छोटे कपड़े पहनकर कांपती हुई सामने से गुज़रती हैं तो हैरत होती है कि यह कैसा चस्का है ! फैशन के वश में या फिर समाज को खुली चुनौती देने या फिर महिला सशक्तिकरण को छोटे, आधुनिक, अधखुले कपड़ो से जोड़ने के चक्कर में अजीब सी ड्रेसेस चलन में आ गयी हैं । कोई एक कन्धा खोले घूम रही है, कोई बैकलेस ड्रेस में है, कोई दोनों कंधों और अपनी नैकलाइन खोले जा रही है, कोई कमर दिखाती तो कोई टाँगे दिखाती चली जा रही है । यह सब हमारे बॉलीवुड और बॉलीवुड के अंधे अनुसरण की देन है । मेरी सोच से यह सब सिर्फ महिलाओं के ओब्जेक्टिफिकेशन का तरीका है और इसका महिला सशक्तिकरण (women empowerment) से कोई लेना देना नहीं है । आप मौसम और अवसर के हिसाब से कपड़े पहने, यह सीधा सा मानना है मेरा । कहने की ज़रूरत नहीं कि मेरे घर में मैंने कभी ऐसे परिधानों को स्थान नहीं दिया । मगर यह क्या ! मेरी बेटी को दीपिका पादुकोण वाली छमिया ड्रेस चाहिए जो यहाँ-वहाँ से कटी फटी हो ! हाय! इस तरह मैं आदर्श बनने में नाकामियाब रहूंगी , मैंने सोचा ना था ।

कहते हैं यह दुनिया के रास्ते, कोई मंजिल नहीं है तेरे वास्ते

नाकामियों से नाता मेरा जोड़ा

दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा ।

आज सुबह मेरी बेटी चहकती हुई मेरे पास आई और बोली ‘ माँ, मैंने सपने में देखा कि मेरे पास एक जादू की छड़ी (magic wand) आ गयी है और मेरे रूम का कलर गुलाबी हो गया है । मेरी सारी ड्रेस भी गुलाबी हो गयी और मैचिंग के गुलाबी सेंडल से मेरा रूम भर गया है ।‘ हाय! यह क्या क्या सुनना पड़ रहा है और अभी क्या क्या देखना बचा है ! गुलाबी!!!!!! मैंने पूरे होश में यह फैसला लिया था कि यह बेटा ब्लू और बेटी पिंक मेरे घर में नहीं होगा । आधुनिक ग्रंथ भी यही कहते हैं gender neutral परवरिश होनी चाहिए और यह बचपन से ही छोटी छोटी बातों में ध्यान रखने वाली बात है । मैंने हमेशा मेरी बेटी को सभी रंगों से दोस्ती करने की राय दी । अपने और अपनी बेटी के कपड़ो में भी सभी रंगों को जगह दी । और आज मेरी बेटी अपना सपना मुझे सुना रही है- गुलाबी । अरे! कोई बताएगा कि क्या हो रहा है ? मैं बेटी को अपनी मिसाल देना चाहती थी , मगर यह सब ऐसा लग रहा है कि उसे मुझमे अनिल कपूर की जगह मोगेम्बो दिखाई देता है । हे आधुनिक ज्ञानियों ! किसी को कुछ कहना है ?

रुला के गया सपना तेरा,

बैठी हूँ कब हो सवेरा ।

माँ बनने के शुरुवाती दौर से ही मैंने कैसी सुन्दर छवि अपने मन में बनायीं थी अपनी सशक्त, ईमानदार, बुद्धिमान, चतुर, चपल, नैसर्गिक सुन्दर और ख़ुशी से कूदती प्रतिभाशाली बेटी की । अपनी तरफ से जो व्यक्तिगत योगदान (लिपस्टिक बलिदान) हो सकता था वो भी किया । और आज छः साल में मुझे ऐसा लगने लगा है कि सब व्यर्थ रहा । मुझे संशय है कि जो लोग आधुनिक पेरेंटिंग के ग्रंथ बना रहे हैं उन्होंने सचमुच कभी किसी बच्चे की परवरिश की है । यह सब कोरा, थोथा ज्ञान है, मिथ्या है । मैंने तो सोच लिया है कि मैं चिया को अपने लिए आश्चर्य की पोटली ही बने रहने दूँ, तो बेहतर । समय से पहले उसकी अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप तस्वीर बनाने का कोई मतलब नहीं है । वो आज जिस समय में हैं उसे उसके पूरे अस्तित्व के साथ स्वीकार करूँ । कहते हैं समय बड़ा बलवान । समय के साथ बच्चे नई नई बातें सीखते हैं और पुरानी सीखी बातें भूलते भी हैं । मेरी बेटी हर अनुभव को जीना चाहती है, नित नए प्रयोग करना चाहती है । कुछ बातें जो आज मुझे अच्छी नहीं लग रही हो सकता है कि आने वाले कल में वो ख़ुद ही उसे छोड़ दे या यह भी हो सकता है कि उसे वो जीवनभर अपने साथ रखे । मुझे संयम रखना होगा और उसके जीवन, उसके चयन को सम्मान देना होगा । उसके इस द्रष्टिगत पहलू के सिवा भी पहलू हैं आत्मीय, मानसिक और हार्दिक । जीवन में यह सभी पहलू महत्त्वपूर्ण हैं और इनकी मजबूती मेरी बेटी को एक मजबूत इंसान बनाएगी ।

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