भों भों

उसके साथ बितायी हुई हर शाम मेरे दिल के बहुत करीब है । वो तैयार होकर आती थी मेरे पास, कभी अपने पहनावे के बारे में पूछती तो कभी अपने सैन्डल के बारे में । मैंने अपनी भरसक कोशिश की उसे जताने की कि वो एकदम लल्लनटॉप लग रही है । लेकिन सच कहूं तो मैंने उसे कभी इन पैमानों पर तौला ही नहीं । वो मेरे लिए बहुत ख़ास है जिससे मैं बेपनाह मुहब्बत करता हूँ । मैंने कभी ढूँढने की कोशिश भी नहीं की कि क्यूँ मैं उसे इतना चाहता हूँ ? क्यूँ उसे देखकर मेरी बांछें खिल जाती हैं और मुहँ खुला का खुला रह जाता है ? वो जब मेरे साथ गलियों से गुज़रती है तो मेरे गुरूर का कोई ओर-छोर नहीं रहता । लेकिन यह भी मैं क़ुबूल करता हूँ कि गलियों में आते ही थोड़ा सा आवारपन मुझपर सवार हो जाता है और उसे वो बिल्कुल पसंद नहीं आता है । गुस्से में कभी-कभी वो “बिच (Bitch)” कह देती है उसे, जिसे मैं ताड़ता हूँ । और कुछ को मैं गुर्रा देता हूँ “साला कुत्ता” । और हद्द तो तब हो जाती है जब वो प्यार से मेरे किसी आवारा दोस्त की तरफ देखती है, मैं पागल होकर उसपर गुर्रा पड़ता हूँ और झड़प हो जाती है । फिर वो मुझे जबरन खींचकर वहाँ से कहीं दूर ले चलती थी और उलाहना देती थी “तुम बड़ी जल्दी ज़ेलेस हो जाते हो” । कुछ देर यूँही मान-मनुव्वल और इधर-उधर मटरगश्ती करके हम घर लौट जाते हैं । वैसे बाकी लोगों को हमेशा लगता है इतनी देर कैसे लग गयी । अब यह उनकी पहेली है और वो ही इससे बूझें ऐसा सोचकर मैंने कभी कोई सफाई पेश नहीं की ।

हाँ, एक बात जो उसके बारे में बहुत ही ख़ास है और जिसे मैं कभी नज़रंदाज़ नहीं कर पाता वो है – उसकी खुशबू । मैं उसे ऑंखें मूंदकर उसकी ख़ुशबू से पहचान सकता हूँ । शायद उसे इस बात का एहसास भी है, शायद यही वजह होगी कि उसने कभी कृत्रिम खुशबू का सहारा नहीं लिया और हमेशा मेरी दुनिया को अपनी अनोखी खुशबू से महकाया है । जब वो मुझसे दूर होती है तो मैं कभी-कभी बहुत बेचैन हो जाता हूँ और दुआ करता हूँ कि सूरज जल्दी ढल जाये और यह ऑफिस से छुट्टी हो । वो जब प्यार से मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ चलाती है तो खुमारी चढ़ने लगती है । मैं अक्सर ही अपना सर उसकी गोद में रख लेता हूँ , और सारी दुनिया के पचड़ो से जैसे पीछा छूट जाता है मेरा ।

बचपन का प्यार है वो मेरा । उसने मुझे हर आकार और अवस्था में देखा है । प्यार अपनी जगह है लेकिन कुछ बातें और चीज़ें मैं व्यक्तिगत रखना पसंद करता हूँ । मिसाल के तौर पर जब मेरा पहला दांत टूटा था और उसने उसे उठाकर अपने हाथ में ले लिया । मैं मानता हूँ कि उसने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था कि इतनी सुन्दर दन्तपट्टिका में खिड़की बन गयी । वो ऐसे परेशान हुई थी जैसे ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना में कोई सुराग हो गया हो । मैं जानता हूँ कि मेरी वो सुन्दर दांतों की लाइन उसे बहुत पसंद थी और जब उस लाइन का एक सिपाही गिर गया तो उसका दुखी और परेशान होना लाज़मी है । मैं ख़ुद भी परेशान था और अपने टूटे हुए दांत को देख रहा था कि यह क्या हो गया? अब मूंगफली कैसे खाऊँगा ? मैं दांत को वापस सेट करने की जुगत लगा रहा था और यह क्या उसने मेरा दांत अपने हाथ में ले लिया । यह मेरे लिए बहुत ही नाग़वार हो गया था । बचपन की नादानी कहें या अपने दांत को लेकर मेरी अधिकार-सम्बन्धी भावना कि मैं बावला हो गया और मैंने कुछ ऐसा करा कि वो बोली “ इतना कितना भौंक रहे हो बे ? ” और फिर वो मुझे मेरे हाल और मेरे टूटे हुए दांत के साथ कुछ देर अकेले छोड़ गयी । कुछ देर तक अपने टूटे हुए दांत को उलट पलटकर देखने और समझने के बाद मुझे पक्का हो गया कि अब इसका कुछ नहीं हो सकता । आख़िरकार मैंने हालातों से समझौता कर लिया । और फिर तो मेरे सारे ही दांत एक-एक कर मेरा जबड़ा छोड़ चले । मेरे जबड़ो में दांतों ने जो जगह खाली की वो खुजली ने भर ली । मगर इस दौर में भी वो मेरे साथ रही और हमारे प्यारे से रिश्ते में दांतभर भी फर्क नहीं आया । यह मेरे लिए बहुत बड़ा सुकून था । मैं थोड़ा शरमाया सा उसके सामने अपना मुहँ खोलता था और वो खिलखिलाकर मुझे kiss कर लेती थी ।

बाकी सब तो ठीक चल रहा था, खाना-पीना तो मेरे नए दांतों के हिसाब से मुझे मयस्सर हो गया । मगर इस खुजली का कोई उपाय ना सूझ रहा था । एक दिन घरवाले मिलकर मुझे जबरन स्कूटर पर बिठाकर डॉक्टर के पास ले गए । मुझे कभी समझ नहीं आया कि घरवालों को स्कूटर इतना पसंद क्यूँ था ? मुझे कोई भी गाड़ी चलेगी लेकिन स्कूटर ! आई हेट स्कूटर । किसी तरह सैंडविच की फिलिंग की तरह मुझे बीच में बिठाकर डॉक्टर के पास पहुँचे घरवाले । मैंने जैसे ही क्लिनिक के अन्दर से रोने बिलखने की आवाजें सुनी मैं उलटे पैर भागने को हुआ मगर धरा गया । फिर मैंने समझाने की कोशिश भी की ‘मैं ठीक हूँ’ मगर सब लोग डॉक्टर से मिलने के लिए ऐसे उत्सुक थे कि किसी ने मेरी एक ना सुनी और मुझे खींचकर अन्दर ले गए । वहाँ मेरे साथ डॉक्टर ने जो अभद्र व्यव्हार किया उसका जिक्र ना करना ही बेहतर है । मैं बहुत ही गुस्सा था – उस डॉक्टर से जिसने मेरे घरवालों को फांस लिया था अपने चंगुल में ।

डॉक्टर से कुछ ना हुआ मुझे ख़ुद ही अपनी खुजली का कोई उपचार करना था । घरवालों ने जो आइटम दिये थे उनमे मज़ा नहीं आ रहा था । एक रात मैं बहुत बेचैन हो रहा था और सब सो रहे थे । मुझे उसकी बहुत याद आ रही थी और मैं कब धीरे-धीरे छोटे डग भरते उसके जूतों की अलमारी तक पहुँच गया मुझे पता ही नहीं चला । वहाँ उसके जूतों की महक ने मुझे और भी उन्मत्त कर दिया, खुमारी चढ़ने लगी और मैंने उसका जूता अलमारी ने निकाल लिया । कुछ देर उसे सामने रखकर देखता रहा, फिर नाक के पास लाकर सूंघ लिया और बस यहीं मेरा पैर फिसल गया और मैं ख़ुद को सम्भाल नहीं पाया । मैंने उसके जूते चाटने शुरू कर दिये और कब मेरे जबड़े मैंने उसपे गडा दिये मुझे कुछ याद नहीं । मैंने जी भर के उसके जूतों को चबाया और ऐसा नशा चढ़ गया था मुझपर कि मैं सर को झटक झटक कर जूता जबड़ो के बीच दबाये हांफ रहा था । जूता कब तक खैर मनाता आख़िर वो कुछ टुकड़ो में टूट गया और तब मुझे लगा ‘ऊप्स! यह तो निपट लिया’ । मैं भागकर अपने बिस्तर में गया और सो गया । सुबह तक मैं भूल चुका था कि गयी रात क्या हुआ ।

मैंने रोज़ की तरह उसको उठाना शुरू किया । उसके बिस्तर में घुस गया । पहले उसके पैरों पे अपनी ठंडी सी नाक छुवाई । मुझे पता है उसे गुदगुदी हो जाती है मेरे ऐसा करने से । फिर मैं उसके चेहरे के पास आया और उसके गालों पे अपनी जीभ लगा दी । उसने मुस्कुराकर मुझे अपनी बाहों में लपेट लिया । मैं इस साज़िश में फसने वाला नहीं था, मैं झटपट बिस्तर से कूदा और जोर से गुड मोर्निंग की “भों-भों” । फिर अपनी चेन लेकर आया और उसके हाथो में दे दी । एक दो चक्कर गोल-गोल अपनी पूँछ पकड़ने की कोशिश में लगाये और वो खिलखिलाती हुई बिस्तर से निकली और दरवाज़े की तरफ बढ़ी । थोड़ी देर के बाद वो अपने जूतों की अलमारी के पास गयी और …… । वो मेरे पास लौटकर आई जूते का एक हिस्सा लेकर । मुझे दिखाया और पूछा “ यह क्या है ? “ मुझे सब याद आ गया । मैंने अपनी गर्दन झुकाई और आँखें नीची करके छोटी सी जीभ बाहर निकाली । उसने जूते का टुकड़ा नीचे ही रख दिया तो मैंने गर्दन घुमा ली । यह साफ़ इनकार था कि मैं नहीं जानता यह क्या है, मुझे मत दिखाओ । मैं जिधर जिधर मुहँ घुमाता वो जूते का टुकड़ा उधर रख देती । मैं इनकार करता रहा मगर वो भी डटी रही तो मैंने अपना एक हाथ उठाकर उसके हाथ पर रख दिया और आँखों ही आँखों में कह दिया ‘सॉरी, अब जाने भी दो’ । मेरी यह अदा अभी बेकार नहीं जाती और उसका दिल हमेशा पिघल जाता है । वो मुस्कुरायी और मुझे हिदायत दी कि अब दूसरे जूते मत काटना । फिर हम दोनों निकल पड़े गलियों में सुबह की सैर करने और दूसरे आवारा दोस्तों से मुक्कालात करने ।

मैं यह तो नहीं चाहता कि इनमे से कोई आवारा मेरे घर आये । लेकिन कभी-कभी उनकी आँखों का सूनापन देखकर दुआ करता हूँ कि कोई कभी इनसे भी प्यार करे, इन्हें अपने घर और जिंदगी में जगह दे । वैसे तो उनकी आँखों में अपने लिए जलन देखकर मैं बहुत इतराता हूँ मगर जब कड़क सर्दियों में अपने बिस्तर पर लेटता हूँ तो अक्सर ही उनका ख्याल आ जाता है कि ना जाने कहाँ किस हाल में होंगे मेरे वो आवारा जलनखोर ।

इमेज क्रेडिट : http://alankennel.com

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2 Comments Add yours

  1. Deepak says:

    Wow, beautiful literally loved it.
    Please some more on this special member of life.

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      थैंक you… 🙂

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