बिटिया रानी, यह घर है कि प्रयोगशाला ?

पिछले कुछ दिनों दिल्ली में ठण्ड ज्यादा होने की वजह से स्कूल बंद चल रहे थे । बच्चों की ख़ुशियों का क्या कहना वैसे तो माँ की ख़ुशियों का भी क्या कहना । लेकिन अगर यही सोचकर कहना छोड़ दिया तो ब्लॉग कैसे बनेगा ! इसलिए चलिए दोनों की ख़ुशियों का कुछ कुछ कह लेते हैं ।

तो हुआ यूँ कि सुबह आँखें मलते हुए हम पहुँचे गुसलखाने (Bathroom) में और टूथब्रश उठाया, टूथपेस्ट लिया और रोज की तरह पेस्ट लगाने से पहले टूथब्रश धोया । अब बारी थी पेस्ट को ब्रश पे लिटाने की तो हमने पेस्ट दबाया । ओहो! लेकिन क्या देखते हैं कि पेस्ट से पानी की धार छूटी ! शंकित हुए कि पेस्ट को भी ठण्ड में शू-शू आती है ? यो तो पहली बार देख्या ! नींद गायब और उत्सुकता सवार । फिर पेस्ट को और दबाया तो ढीला सा पेस्ट ब्रश पे आया । हमने सोचा महंगाई में पेस्ट को वेस्ट क्या करना… चलो ऐसे ही कर लेते हैं । अब बारी पतिदेव की आई । वो भी पहले चौंके फिर हमे आवाज़ दी “पेस्ट को क्या हो गया?” हमने भी चुटकी ली “सर्दी हो गयी है” । पतिदेव मुस्कुराये और वो भी अपना ब्रश निपटाकर आये और बैठ गए चाय के इंतज़ार में । चाय चल ही रही थी कि मेरी नन्ही परी अपनी छोटी-छोटी उँगलियों से अपनी अधखुली आँखें मलती कमरे में आई । उलझे हुए लम्बे बाल कुछ लहराकर चेहरे पे भी आ गए थे । आहा ! कितनी सुन्दर और प्यारी लग रही थी मेरी बेटी । ममता एक ऐसा दर्पण है जिसमे अपने बच्चे की छवि हर माँ के लिए बहुत ही मनभावन और अलबेली होती है । हम दोनों पति पत्नी लपके अपनी बेटी को गोद में लेने के लिए । कुछ देर उसकी अलसाई हुई भोली सूरत और छोटे-छोटे हाथ पैर देखकर ख़ुद को तृप्त करने की कोशिश की । फिर उसे भी गुसलखाने जाने को कहा और वो कूद के दौड़ पड़ी । यह तो आज से पहले कभी नहीं हुआ था । वो गयी, सरपट ब्रश पे पेस्ट लगाया और आनंदित, विजयी भाव से कोयल सी बोल उठी “देखो, मैंने क्या किया” ? हम दोनों भागे और देखा कि बेटी की आँखों में दामिनी सी दीप्ति थी और वो ऐसे पुलकित थी जैसे कोई वैज्ञानिक अपनी नई खोज पर गर्वान्वित हो । फिर मुस्कुराकर बोली “रोज पेस्ट लगाने से पहले ब्रश को धोना पड़ता था , क्या टाइम की बर्बादी होती थी । देखो मैंने पेस्ट में पानी भर दिया अब ब्रश उठाओ और सीधे पेस्ट लगाओ । देखा काम कितना आसान हो गया ।“ बेटी rocked माँ-पापा shocked !

फिर राज़ का खुलासा हुआ कि आधा पेस्ट बहा दिया तो जगह बन गयी पानी की । तभी तो कल रात को ब्रश करने में मुझे इतनी देर लगी । हम दोनों ने ख़ुद को संभाला और फिर मुस्कुराकर कहा “अरे वाह! हमे तो यह आईडिया आया ही नहीं । बहुत बढ़िया ।“ पतिदेव ने आगे जोड़ा “लेकिन चिया अगली बार ऐसा मत करना, पेस्ट वेस्ट हो गया ना ढेर सारा ।“ बेटी कहती है “अगर मैं पेस्ट को किसी डब्बे में रखूँ तो ?” पतिदेव अब क्या कहते, आतुरता से मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे विनय कर रहे हों “बचाओ !” मैं मुस्कुरायी और बेटी से कहा “ठीक है, मुझसे डब्बा ले लेना” ।

बच्चों की छुट्टियाँ उन्हें अवसर देती हैं परिवार की समस्याओं में अपना सहयोग देने का और अपनी कुछ समस्याओं का हल निकालने का । परिवार की समस्या तो मेरी बेटी ने सुलझा दी, अब उसकी अपनी एक परेशानी चल रही थी, समय आ गया था उसका हल ढूँढने का ।

वो कई बार मुझसे शिकायत कर चुकी थी कि “फ़ेविकोल सफ़ेद ही क्यूँ होता है? पेंसिल, इरेज़र, शार्पनर, बुक्स और एक्टिविटी की सारी चीजें तो रंग-बिरंगी होती हैं “। मैंने उससे कह दिया था कि “जब तुम बड़ी हो जाओगी तो कुछ करना इस बारे में “मैं अनुमान नहीं लगा पाई थी कि मेरी बेटी छः साल में ही ख़ुद को बड़ी घोषित कर देगी ! तो अब मेरी बेटी बड़ी हो गयी है और उसे फ़ेविकोल रंगीन करना है । अपने कमरे में जाकर उसने फ़ेविकोल निकला और बड़ी देर तक गहरी सोच में डूबी रही । बिजली की गति से अचानक उठी और अपने ट्यूब कलर्स निकल कर सामने रख लिए । फिर कुछ देर एक पैर का पंजा हिलाती रही और सारी योजना तैयार हो गयी । सहायक के तौर पे मुझे नियुक्त किया गया और आदेश हुआ कि रसोईघर से पानी और कुछ प्लास्टिक के बर्तन पेश किये जायें । आज्ञाकारी सहायक की तरह हम तुरंत सभी चीज़ें लेकर पहुँचे । बेटी ने पहले सारे डब्बों में पानी डाला और फिर ट्यूब कलर मिलाया । अब सभी डब्बों में अलग अलग रंग का गाढ़ा पानी था । अब वैज्ञानिक ने पूरे आत्मविश्वास से फ़ेविकोल उठाया और सारे डब्बों में बराबर बराबर डाल दिया । कुछ डब्बे मुझे मिले मिक्सिंग के लिए और कुछ डब्बे उसने लिए । और बहुत देर की मेहनत के बाद हमारे पास अलग अलग डब्बों में तरह तरह के रंगीन फ़ेविकोल थे । उनसे कुछ चिपक सकेगा ऐसा कहने में मुझे थोड़ा संदेह था तो मैंने जिज्ञासु मन की बात अपनी बेटी के सामने रखी । उसने बड़े सहज भाव से कहा “देखते हैं, अभी तो इसे थोड़ा सुखाना पड़ेगा” । और फिर उन डब्बों को सूखने छोड़ हम दोनों अलग- अलग कामो में लग गए । कुछ ही दिनों में मेरे घर में जगह-जगह मोटा मोटा रंगीन थक्का कहीं कहीं चिपका पाया जाने लगा । एक दिन पतिदेव की बनियान कुर्सी से बार-बार चिपक रही थी तो उन्होंने पूछा “ क्या लगा है इसमे “? मेरी बेटी चहक कर बोली “पापा, हरे रंग का फ़ेविकोल ।“ एक बार फिर से बेटी rocked माँ-पापा shocked !

मेरी बेटी तरह तरह के प्रयोग करती रहती है और मैं और मेरे पति उसे उसके प्रयोगों से कभी नहीं रोकते हैं । रुपये-पैसो और चीजों का अपना महत्तव है लेकिन हमारे बच्चों की जिज्ञासा और कुछ नया करने की रचनात्मकता उससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है । आज बच्चे छोटे हैं और अपने प्रयोगों में वह कुछ सामान की बर्बादी भी मचाते हैं लेकिन बच्चे इन सब प्रयोगों से आत्मविश्वास और रचनात्मकता का ऐसा सुन्दर गहना अपने लिए बनाते हैं जो जिंदगीभर उनके व्यक्तित्व को सजाता है । बच्चे और आपके साथ बिताये हुए पलों की बेहद ख़ूबसूरत यादें आपके परिवार को देता है ।

🙂

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