लेख की गगरिया और कमेंट्स की कंकड़िया – हाय ! फोड़ डाली !

आज के समय में आधुनिक माध्यम (सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) ने हर व्यक्ति को इतना सक्षम बना दिया है कि वो जब चाहे अपने विचार एक बहुत बड़े समूह में साझा कर सकता है । बहुत से लोगों के लिए कम शब्दों में अपनी बात कह पाना संभव नहीं होता तो वो तरह तरह की ब्लॉगिंग साइट्स पे ब्लॉग लिखते पाए जाते हैं । उनमे से एक मैं भी हूँ । और बहुत से लोग अपने सामान्य जीवन में से बहुमूल्य समय निकालकर इन लेखों को पढ़ते हैं । उन्हें भी इस आधुनिक माध्यम ने उनकी बात कहने के लिए कमेंट्स और भावनाएँ व्यक्त करने वाले इमोटिकॉन्स से सज्जित किया है । मैं अपने सभी पाठकों की हृदयातल से आभारी हूँ जो मेरे लेखों के माध्यम से मुझसे जुड़े हुए हैं ।

आज मैं अपने पाठकों से और अपने ब्लॉगर मित्रों से अपने असमंजस से प्रयोजन तक की यात्रा साझा करना चाहती हूँ । जब मैंने लिखने की शुरुवात की थी तो मन में एक असमंजस (Confusion) था कि ना जाने मनोभाव सही शब्द पा पायेंगे या नहीं ? अपना लेख पढ़ा और सन्तुष्टि के बाद सबके पढ़ने के लिए सोशल मीडिया पर डाल दिया । अब असमंजस जिज्ञासा (Curiosity) में परिवर्तित हो गया कि लेख को पाठक मिलेंगे या नहीं ? पाठकों को लेख कैसा लगेगा ? पाठकों ने लेख का स्वागत किया और धीरे धीरे पाठकों की सराहना से मन पुलकित हो उठा । अब मन की जिज्ञासा कौतूहल (Excitement) में बदल गयी थी । कुछ अतिउत्साही या अतिभावुक पाठकों ने भूरि-भूरि प्रशंशा कुछ इस प्रकार से की कि लगने लगा मैं मेरी कलम से दुनिया में एक सकारात्मक बदलाव ला सकती हूँ । अब तो कौतूहल प्रयोजन (Purpose) में बदल गया । पता ही नहीं चला कि दबे पावँ अहंकार भी दिल में आ गया कि मुझमे कुछ ऐसा है जो दूसरों में नहीं है और दुनिया को मेरी बहुत ज़रूरत है । कुछ तारीफ़ों ने मुझे इस तरह भ्रमित कर दिया कि मुझे लगने लगा कि मैं दूसरों से कहीं बेहतर हूँ और मुझे अनकहा अनसुना अनुरोध या आदेश हो गया है दूसरों को ज्ञान (Lecture) देने का ।

यह मेरी ब्लॉगिंग यात्रा का वह मोड़ था जहाँ मैंने जो लिखा वो बस एक उद्देश से लिखा कि मुझे समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है । लोगों को ज्ञान देना है । अपने आपसे की हुई यह अपेक्षा (Expectation) कब मेरे लेखों से माधुर्य और चपलता लेकर मुझे बोझिल शीर्षकों और गंभीर शब्दों तक ले गयी इसका भान (Awareness) मुझे बहुत देर बाद हुआ ।

एक पाठक के तौर पर भी मैं कई मोड़ो से गुज़री । जब मैं लिखती नहीं थी तब बहुत सिमित लेख पढ़ती थी और जो लेखक की बात दिल को छूं गयी तो ख़ुशी से उसका शुक्रियादा करते हुए कमेंट लिख देती थी । और अगर कुछ नहीं पसंद आया तो उसे लेखक का नजरिया समझकर वही छोड़ बिना कमेंट किये आगे बढ़ जाती थी । जब मैंने लेखक और पाठक दोनों हो गयी तो मैं पाठक से समीक्षक (Analyst and Critic) बन गयी । मैं ज्यादा लेख पढ़ने लगी । लेखों की समीक्षा अब मेरे कमेंट्स में आने लगे । जब एक लेखक के तौर पर मैं उद्देश्य (purpose) वाले पड़ाव पर आई तो मैंने सारे लेखों में उद्देश्य ढूँढना शुरू कर दिया और सारे लेखकों को समाज का रंग-रूप बदलने का उत्तरदायी समझ लिया । ऐसे में मेरे कमेंट्स ने और भी भीषण रूप ले लिया और मैंने लेखकों को खूब खरी खोटी सुनाई । जिन लेखकों ने मेरे जीवन मूल्यों (values) के ख़िलाफ़ लिखा उनसे मेरी व्यक्तिगत रंजिश हो गयी । आधुनिक मीडिया ने एक पाठक को लेखक की स्क्रीन तक ही पहुँचने का अधिकार और साधन दिया अन्यथा ना जाने क्या अनर्थ हो जाता !

एक दिन अपने सहयोगी ब्लॉगर से बातचीत करते हुए अनायास ही मुझे आभास हुआ कि मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गयी ! इस यात्रा में मेरे कई मित्र बने जो मुझे अति प्रिय हैं । लेकिन एक सवाल बार बार दिमाग में हथौड़े मारता रहा कि बदलाव क्या आया ? मुझे एक भी पाठक ऐसा नहीं याद आया जिसने कभी कहा हो कि उसमे बदलाव आया । मैंने अपने आस-पास समाज को देखा तो भी ऐसा नहीं लगा कि कोई बदलाव आया । घनघोर निराशा हुई और लगा कि मैं एक लेखक के तौर पे विफल रही । लेकिन अहंकार ने फिर हाथ थामा और कहा अकेले तुम ही नहीं हो और भी बहुत से हैं जो बदलाव लाने के लिए लिख रहे हैं (want to make a difference in society), उन्होंने भी क्या उखाड़ लिया ? बदलाव लाने में समय लगता है । कुछ तस्सली तो हुई ऐसा लगा मेरे अस्तित्व पे लगा प्रश्नचिन्ह कुछ तो धुंधला हो गया है । लेकिन मन को फिर भी शांति नहीं हुई और व्यग्रता बढ़ती रही । ऐसे में मेरी छः साल की बेटी ने कुछ ग़लती कर दी और मैंने उसे बहुत तेज़ डांट दिया । उसकी आँखों में आँसू आने को हो गए । और मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया “यह बदलाव आया” । मैं जब तक उद्देश्य के फ़ेर में नहीं पड़ी थी तब तक ख़ुद को खुश करने वाले और दूसरों में खुशियाँ बटोरने वाले लेख लिखती थी । लिखकर मन खुश होता था और खुश माँ अपनी बच्ची को ऐसे डाँटती नहीं थी बल्कि उसमे तो इतना संयम था कि उसकी बाकी सहेलियां कहती थी “आपको कभी गुस्सा आ ही नहीं सकता” । यह आया बदलाव- मन में ख़ुशी, सहजता, माधुर्य और धैर्य की जगह व्यग्रता और क्रोध ने ले ली । क्रोध- सारी दुनिया से, उसकी नकारात्मकता से, उसके स्थायी अनाचरण से, अपनी विफलता से और अपने आप से । कैसा बदलाव है यह ? क्या सोचा था और क्या हो गया ? दुनिया ना बदली और हम ख़ुद बदलकर क्या हो गए ?

मन खिन्न हो गया और मन में कुछ ऐसा चलने लगा-

चलूं आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं‚ राह कौन सी जाऊं मैं?

सपना जन्मा और मर गया‚ मधु ऋतु में ही बाग झर गया‚

तिनके बिखरे हुए बटोरूं या नव सृष्टि सजाऊं मैं‚ राह कौन सी जाऊं मैं?

दो दिन मिले उधार में‚ घाटे के व्यापार में‚

क्षण क्षण का हिसाब जोड़ूं या पूंजी शेष लुटाऊं में‚ राह कौन सी जाऊं मैं?                           -अटल बिहारी वाजपाई

इस दुविधा में मैंने सबसे पहले तो ब्लॉगिंग अनिश्चित काल के लिए स्थगित की । बुरी आदतें लग तो बड़ी जल्दी जाती हैं लेकिन उनसे पीछा छुड़ाना उतना ही मुश्किल होता है । मैं अपने कुमेंट्स पूरी तरह से बंद तो नहीं कर पाई पर लेखों पर अपने कमेंट्स देने कम किये । आलोचक से एक साधारण और सामान्य पाठक बनकर लेख पढ़े और बिना खिन्न हुए आगे बढ़ गयी । फिर से जीवन साधारण और सुखमय हो गया । लेकिन एक कमी महसूस होने लगी, अपने आपको समाज में अभिव्यक्त करने की कमी । बिना समाज को बदलने के बड़े उद्देश्य और बिना ख़ुद को बड़ा लेखक समझते हुए कुछ बस यूँही निर्मल आनंद के लिए लिखने की कमी । तभी हमने हिंदी में ब्लॉग लिखने की नई पहल की । मैंने एक बार फिर से ब्लॉग लिखना शुरू किया लेकिन बिना किसी उद्देश्य के । फिर से लिखने से वही ख़ुशी और सन्तुष्टि मिलने लगी जो ब्लॉग लिखने के शुरुवाती दिनों में मिलती थी ।

किसी ने बहुत खूब लिखा है कि

जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी, और जो भी पाया वो प्रभु की मेहरवानी थी,

खूबसूरत रिश्ता है मेरे और भगवान के बीच में, ज्यादा में मांगता नहीं और कम वो देता नहीं  ।।

मैं खुश हूँ अपने छोटे से जीवन में और खुश हूँ उन लोगों के जीवन में महत्त्वपूर्ण (significant) योगदान देकर जिन्हें मेरी ज़रूरत है । समाज को मेरा यही योगदान है कि मैं और मेरा परिवार समाज की एक सभ्य और सकारात्मक कड़ी हैं । करीना और तैमूर को सांत्वना और उलाहना देने वाले बहुत मिल जायेंगे और यह बात मैं दावे से कह सकती हूँ कि उनमे से हर कोई समाज में अच्छा बदलाव लाने की नीयत से ऐसा कर रहा है लेकिन यह भी मेरा दावा ही है कि इससे बदलेगा कुछ नहीं । हर व्यक्ति ख़ुद वो बदलाव बने जो वो समाज में देखना चाहता है क्यूँकि लिखित ज्ञान हममे से कोई भी लेने को तैयार नहीं है ।

मेरे प्यारे ब्लॉगर दोस्तों मैं बस इतना इंगित करना चाहती हूँ कि आप बहुत लोड ना लें परिवर्तन का और सहज भाव से लोगों को बस इशारा कर दें और उन्हें एक ख़ुशनुमा एहसास दें । आपका पाठक ना जाने किन परेशानियों से गुज़र रहा हो और आपका एक लेख उसके जीवन में और भी दुःख और उदासी भर दे ऐसा आप कभी नहीं चाहेंगे । अन्जाने में यदि कभी आपसे ऐसा हो जाये तो भावुक और व्यथित पाठकों की प्रतिक्रिया को दिल से ना लगायें और व्यक्तिगत ना हों ।

और मेरे प्यारे पाठकों आप भी लेख को एक आलोचक की तरह नहीं एक दोस्त की तरह पढ़े । अच्छा लगे तो लेखक को बताएं और अच्छा ना लगे तो उसे लेखक का नजरिया समझ कर छोड़ दें । आप भी अपने कमेंट्स से बदलाव लाने की कोशिश ना करें । क्यूंकि कई बार यह कोशिशें दिल दुखाने से ज्यादा कुछ और नहीं कर पाती । आप समझदार हैं और समझते हैं कि ज़रूरी बातचीत ख़ासकर एक दूसरे को अपने पक्ष में सहमत करने की बातचीत लिखित तौर पे लगभग असंभव है । ऐसी बातें आमने-सामने बैठकर हों तो कुछ नतीजा आ भी सकता है ।

बहुत सुन्दर पंक्ति पढ़ी कल आपसे भी साझा करती हूँ –

ए अंधेरे शुक्रिया जो अब तक साथ निभाया है , कहे तो दीये से तेरी आज दोस्ती करा दूं, उसी के पहलू में महफूज एक जगह दिला दूं !!

🙂

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