चिया और सिनेमाघर

कल एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन था, हमारे घर के लिए | मेरी छः वर्षीया बेटी को सिनेमाघर में फ़िल्में देखने का कोई शौक नहीं बल्कि अगर यह कहूँ कि उसे ऐसा करना सख्त नापसंद है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी |

जब मेरी बेटी छोटी थी तो तेज़ आवाज़, घने अँधेरे में इतने बड़े पट पे नाटकीय चलचित्र का चलना और ढेर सारे लोगों की उपस्थिति मेरी बेटी को आकुल ना कर दे, इस डर से उसके पैदा होने के बाद हमने काफ़ी लम्बे अंतराल तक कोई फ़िल्म ना देखी सिनेमाघर में | जब वो अपने निर्णयों को ख़ुद लेने योग्य हो गयी तो उसने कहा कि उसे ज़ूटोपिया फ़िल्म बड़े परदे पर देखनी है |

हम दोनों पति पत्नी खुश हो गए कि हमारे दिन बहुरे | अब फिर से हम सिनेमाहाल का लुत्फ़ उठा सकेंगे | हम सब ने उत्साह की पराकाष्ठा को छूते हुए झटपट ऑनलाइन टिकिट बुक करायी और अगले ही दिन की दोपहर का शो पक्का हुआ | मेरे पति ऑफिस से सीधे सिनेमाघर पहुँचे और हम दोनों माँ और बेटी घर से सज-धज ऑटो करके गंतव्य स्थान पे पहुँचे | एक दूसरे को देख अति हर्ष हुआ और ख़ुशी, उत्साह अपनी चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया | हम तीनो की दन्तपट्टिका ने अपनी बेहतरीन चमक से हमारे चेहरों की रंगत ही बदल रखी थी | नियत समय पर हम अपनी अपनी सीट पे बैठ गए और कुछ ही ट्रेलर के बाद फ़िल्म शुरू हो गयी | इतने लम्बे अंतराल के बाद बड़े परदे पे ट्रेलर देखने का सुख भी अवर्णनीय है |

सुखद भाव में लिपटे हम तीनो ने फ़िल्म का स्वागत किया और थोड़ी ही देर में मेरी पांच वर्षीया बेटी अपनी सीट से उतर कर खड़ी हो गयी | मैंने झुककर देखा कि जाने की मंशा से खड़ी हुई है या फिर अति उत्साहित होने की वजह से ? अँधेरे में ज्यादा कुछ समझ नहीं पाई तो पूछ लिया “बेटा, सब ठीक ? “ बेटी ने हाँ कर दी | लेकिन फिर फ़िल्म में अचानक भालू आ गए, खूंखार भालू | इतने बड़े परदे पे ऐसे निष्ठुर, आतातायी और भीमकाय भालू देखकर मेरी बेटी परेशान होने लगी और जैसे ही उस भालू ने गर्जना की और पंजे चलाये | उसका धैर्य छूट गया और वो विह्वल हो गयी उसकी आँखों में आँसू भर आये और उसने पापा से कहा “मुझे नहीं देखनी यह फ़िल्म” | और हम तीनो बाहर आ गए | बाहर आके सिनेमाघर की परम्परा को यथोचित सम्मान देते हुए हमने एक पॉपकॉर्न बाउल और पानी लिया | बाहर बैठकर खाया पीया और बेटी के वापस सामान्य होने के बाद घर की ओर वापस चल पड़े | घर पहुँचकर मेरी बेटी ने ऐलान किया कि अब से वो सारी फ़िल्में घर पे ही देखेगी |

उसके बाद कभी उसने किसी फ़िल्म को सिनेमाघर में देखने की इच्छा नहीं जताई और हमने इसका पूरा सम्मान किया | फिर कल की शाम अचानक एक क्रांति हुई | जिसके लिए मैं आमिरखान, करन जौहर के कॉफ़ी शो की तहे दिल से आभारी हूँ और सबसे ज्यादा हमारे आदरणीय DM साहब की, जिन्होंने रविवार को स्कूल की छुट्टियाँ २ दिन के लिए और बढ़ा दी | यह तो मुबारक मौका था और जश्न तो बनता ही था |

मेरी बेटी ने दंगल देखने की बात की | जैसे बिल्ली के भाग से छींका फूटा हो हम वैसे उल्लास में आ गए | हम दोनों पति पत्नी जो कि सदैव फ़िल्में देखने के लिए तत्पर रहते हैं, तुरंत ही अवसर का लाभ उठाके ऑनलाइन टिकिट लिया और अगले ३० मिनट में हम सिनेमाघर में थे | इस बार काफ़ी बदलाव आया, इस बार हम तीनो घर में जिस पौशाक में थे उसी के उपर जैकेट डाल के सिनेमाघर भागे थे | वहाँ जाके बैठे और फ़िल्म शुरू हुई शुरू के कुछ हल्के फुल्के घटनाक्रमों के बाद ही कुछ ऐसा होने लगा कि मेरी बेटी परेशान होने लगी |

उसको आमिरखान की तानाशाही से उलझन होने लगी और वो हर दृश्य में अपनी टिपण्णी देने लगी “ऐसे किसी को तंग नहीं करते..जबरदस्ती की क्या ज़रूरत ?” और जब उन दोनों लडकियों के बाल कटे तब तो हद्द ही हो गयी | लेकिन फिर बेटी को बताया कि उनके बालों में जूँ होने की वजह से बाल कटे हैं तो उसने आमिरखान को बक्शा और फ़िल्म आगे देखने को राज़ी हुई | लडकियाँ बड़ी हो गयी और फ़िर एक बेहद आप्पतिजनक द्रश्य आ गया जब गीता ने आमिरखान से दंगल किया |

मेरी बेटी दुखी हो गयी और उसने टिपण्णी की “बुड्ढे लोगों से जवान लोगों को ऐसे फाइट नहीं करना चाहिए…वो मर भी सकते हैं” मेरी संवेदनशील बेटी व्यग्र होने लगी | फ़िर गीता वापस लौट गयी और मेरी ठीक हुई | उसके बाद अंत में फ़िल्म पूरी करना हमारे लिए बहुत ही कठिन होने लगा क्यूंकि फिर एक नाटकीय मोड़ आया | आमिरखान को गीता की फाइनल फाइट से पहले किसी कमरे में बहुत ही असहाय तरीके से बंद दिखाया गया | मेरी बेटी पहले तो पूछ रही थी कि ऐसा क्यूँ कर रहे हैं ? अब क्या होगा ? और फ़िर हमारे जवाबों से निराश होकर रोने लगी |

उसको हमने खुश करने की कोशिश की यह बता कर कि गीता जीत जायेगी | मगर वो खुश नहीं हुई | और फ़िल्म खत्म होने पे मेरी छः साल की बेटी बोली “क्या बकवास फ़िल्म थी यह..मुझे पसंद नहीं आई” |

उसकी लगातार टिप्पणिओं ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया कि ऐसी फ़िल्में बनती क्यूँ हैं ? मनोरंजन के लिए या प्रेरणा के लिए ? यदि प्रेरणा के लिए बनती हैं तो असल कहानी को तोड़ मोड़ के पेश करने की क्या वजह होती है?

क्या हमे असल जिंदगी और उसके किस्से प्रेरणादायक और रोचक नहीं लगते ?

क्या जब तक किसी वास्तविकता को नाटकीय वस्त्र ना लपेटे जायें वो हमारा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाती ?

गीता, बबीता, बलाली और महावीर सिंह फोगाट का यदि असल चरित्र और उनकी परिस्थियों से उनका यथार्थ संघर्ष यदि फिल्माया जाता तो क्या होता ?

🙂

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