भिक्षाम्देही भिक्षाम्देही

कल एक बालक देखा किसी ट्रेफिक सिग्नल पे । कितना मस्त था अपने आप में । उसे कोई आभास नहीं था खुदके उस सड़क पे होने का और दूसरों के गाड़ी में होने का । उसे कोई दुःख नहीं था, अपने पुराने कपड़ो का और ना उसको परवाह थी कि दूसरे ने क्या पहन रखा है । उसे अपने मटियाले कपड़ो से शिक़ायत नहीं थी और वो मस्त उसमे खेल रहा था । कौन कहता है कि दरिद्रता कपड़ो से, रहने की जगह से, या फ़िर स्वादिष्ट पकवानों से सम्बंधित है ?

उस मस्त शैशव को देखो, तो लगता है आदमी व्यर्थ ही बेमतलब बावला हो गया है इन साधनों के पीछे । ऐसा उन्मत्त हुआ कि भूल ही गया निर्मल आनंद किसे कहते हैं ?

सहसा मुझे मेरे बचपन का स्मरण हो आया । जब मेरे पास एक पेंसिल होती थी और उसे मैं कितना सम्भाल कर इस्तेमाल करती थी । जब वो पकड़ में आने लायक नहीं रह जाती थी तो उसके पीछे किसी पेन का कैप लगाके इस्तेमाल करती थी ।

एक पेंसिल पूरी तरह खत्म होने के बाद ही दूसरी पेंसिल मिलती थी । इसकी एक वजह यह थी कि वो समय मेरे पिताजी का ख़ुद को मजबूत करने का शुरुवाती दौर था । नई नई नौकरी थी और गावं से शहर आये हुए कुछ समय ही हुआ था तो आर्थिक तौर पे एक निम्न वर्गीय परिवार था हमारा । दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि उस समय लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) बहुत कम थी । इसी वजह से उस समय लोगों के शौक भी उनकी आर्थिक परिस्थियाँ ही निर्धारित करती थी । उस समय लोगों के शौक कुछ ऐसे होते थे –

पेन की निब इक्कठा करना

खाली माचिस के डब्बे इक्कठा करना

खाली रिफ़िल्स इक्कठा करना

इनसब शौकों को पूरा करने के लिए पैसों की ज़रूरत नहीं होती थी । तो क्या हमने कभी दरिद्रता का मोल चुकाया था या हमारी खुशियाँ कम थी या हमारा बालपन आभावों का सिलसिला रहा? नहीं । बिल्कुल नहीं । हमारा बालपन सुन्दर था और मस्त था । मुझे याद नहीं आता कि कभी इन बातों को लेकर मैं किसी हीन भावना से ग्रसित रही या मेरे जीवन में हर्ष और उल्लास की कोई कमी रही । बिल्कुल सड़क के इस बालक की तरह ।

लेकिन यह क्या ! जैसे ही ट्रेफिक रुका वो मस्त और हर्षित बालक तुरंत एक गाड़ी के पास आया और अपने पुराने कपडे दिखाके, चेहरे पे दीन भाव लिए और आँखों में टिमटिमाहट की जगह दरिद्रता भर लाया । घोर आश्चर्य हुआ मुझे कि उल्टी धारा कैसे बहने लगी ! जिससे जग को प्रेणना लेनी चाहिए थी वो ख़ुद ही जग की कुटिलता में घिर गया ।अपना नैसर्गिक भोलापन और पावनता छोड़ स्वांग रचने की कला सीख गया । मन ने प्रार्थना कि यदि यह बस कला ही हो तो अच्छा, कहीं सचमुच यह बालक इस पाखण्ड को किसी दिन जीवनसत्य ना समझ बैठे । जीवन के आनंद और सुख को पैसों में ना ढूँढने लगे और ख़ुद को दूसरों के तराजू में तौल के तुलना के मैदान में ना कूद पड़े । 

आज हमारा समाज ऐसी दहलीज पे आ चुका है जहाँ आर्थिक स्थिति ही मापदंड हो गयी ख़ुशी,  आनंद, उल्लास और उमंग का । हम जैसे ही उस ट्रेफिक वाले बालक को देखते हैं,  मन में करुणा जाग उठती है कि ” बेचारा ग़रीब बच्चा ! कितना दुखी होगा देखो । उसके पास नए कपड़े नहीं हैं । अच्छा घर नही है।”  ना जाने क्यूँ दीन को हम दीन-हीन समझ बैठते हैं ?  यह बस उस दीन का उपहास है या हम स्वयं को भी लज्जित महसूस करते हैं ?

और दुःख इस बात का है कि व्यवस्था की सोच उस बालक तक पहुँच जाती है । जो समय वो खुश होकर बिता सकता था उसमे उसे स्वांग रचना पड़ता है । अगर हम उसे हीन ना समझते तो अपनी करुणा रसधार उसपे ना बरसाते और वो बालक ख़ुद अपनी लगन में, धुन में रहता और अपनी स्थिती सुधारने के लिए सोच पाता । हम उसे अपने पैसों के तराजू में ना तौलते तो वो बिना किसी से अपनी तुलना किये बस अपने आप को और अपने आने वाले कल को अपने आज और अपने बीते हुए कल से बेहतर बनाने की सोच पाता । जिन लोगों की करुणा को वो भुना रहा है उनको अपनी प्रेणना बना पाता और उनसे बिना किसी ईर्ष्या और द्वेष भाव रखे दुनिया साझा कर पाता । काश ! हम ऐसे दया भाव की जगह सबको उनके सम्मान की पात्रता प्रमाणित करने का एक अवसर दे पाते और मानव जीवन को पैसों से अलग देख पाते ।

ट्रेफिक सिग्नल पे या मंदिर के बाहर या रेलवे स्टेशन के बाहर जो अपनी करुणा निर्झरी से ऐसे समाज को सींच रहे हैं उनसे मेरा विनम्र निवेदन है कि इस निर्झरी की दिशा बदलें । त्योहारों पे अपने आस पास काम करने वालो के प्रति अचानक उदार ना हो जायें और उन्हें मुफ्त का खाना और उपहार ना दें । इस बात से असहमत आप भी नहीं होंगे कि जो चीज बिना परिश्रम के मुफ्त मिल जाती है उसका कोई मूल्य नहीं होता । तो अपनी अनमोल मानवीयता को बिनमोल उपहारों में भ्रमित ना करें ।आप सक्षम हैं तो समाज को इन निकटवर्ती लाभों को देने की बजाय दूरदर्शिता का परिचय दें । इन दीन बच्चों को आपसे हीनता और निम्नता का प्रसाद ना मिले ऐसा कुछ करें । इन बच्चों की शिक्षा के विषय में सोचे इनके माता पिता को सक्षम बनाने वाले संस्थानों की नीव रखे । त्यौहार नहीं हर दिन इन दीन लोगों को मुफ्त दवा और मुफ्त शिक्षा मिल सके इसके लिए यत्न करें । अपने बच्चों को यह ना कहें “देखो बेचारा कितना गरीब है” ।अपने बच्चों और आने वाली नस्ल को दीन को हीन दृष्टि से देखने का द्रष्टिकोण ना दें ।

मेरी बेटी की नज़रों में मैं उस बालक के लिए प्रेम, सम्मान और मानवीयता देखना चाहती हूँ, करुणा नहीं और इसके लिए मुझे ख़ुद इस भ्रम जाल से निकलना होगा कि पैसों की उपस्थिति जीवन की ख़ुशियों का पैमाना है । मैंने अपनी बेटी को दिखाया और बताया कि देखो वो बच्चा कैसे मस्त घूम रहा है और खेल रहा है। उसे कोई परवाह नहीं कि उसके कपड़े कैसे हैं ? कितना अच्छा लग रहा है ना उसे ऐसे देखके । मेरी बेटी बोली ” माँ जब मैं कलरिंग करती हूँ तो मैं भी ऐसे ही खुश होती हूँ ना? मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता किसी बात से” । मैं मुस्कुरा दी और मन में एक सन्तुष्टि हुई कि मेरी बेटी को उस बालक में अपने जैसा कुछ दिखा और एक मीठा सा सम्बन्ध जुड़ गया ।

रूपया उसके पास था, मेरे पास प्रेम-गुलाल,

जो भी जिसके पास था, उसने दिया उछाल।

🙂

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