देखो रूठा ना करो

सुबह आँख खुली और बिस्तर पे उन्हें ना पाकर आलस तुरंत बिस्तर से कूद पड़ा और फिर अगले ही पल मुझे रात को हुई अनबन याद आ गयी ।

हुहं ! होंगे अपने कंप्यूटर पे । ऐसा सोचके मुहं बनाके हमने करवट बदली और नये सिरे से सोने की कोशिश की । मगर बाग़ी दिल में अलग ही ख्याल चलने लगे । ना जाने कब से जगे होंगे और ख़ुद से चाय बनानी भी नहीं आती तो यूँही बैठे होंगे मुहँ फुलाके । उठ जाती हूँ । चाय बनाके दे दूँगी लेकिन कुछ बोलूँगी नहीं जब तक कि वो मनाने की पहल ना करें ।आख़िर इतनी छोटी सी बात पे कोई इतना खफ़ा कैसे हो सकता है ? यह तो सरासर ग़लत है । इसलिए उनके गुस्से पे मेरा गुस्सा होना पूरी तरह जायज़ है ।

ओहो ! इस तरह बिस्तर पे लेटे लेटे ही मुकद्दमा दायर कर लेना और जीत भी लेना । ‘चलो, उठो अब’ दिल ने डपट लगायी और हम सरपट उठ गए । चाय बनायी पतिदेव को दी और बिना कुछ बोले अपनी चाय की प्याली लिए तनके चल दिये बालकनी की तरफ़ । सोचा, पीछे आते होंगे तो ज़रा अदा से प्याली हाथ में लिए कुछ देर खड़े रहे । इंतज़ार में चाय ठंडी होने लगी और मिज़ाज़ गरम । फ़िर थोड़ा सा रोना भी आ गया उनकी बेरूख़ी पे ।आँसू और चाय साथ में पीते हुए कुछ देर वहीँ खड़े रहे ।

कुछ और काम निपटाए और नाश्ता भी बिना बातचीत हो गया । अब हमसे रहाइश ना हुई गए और एक कुर्सी खींचके उनके पास बैठ गए  । अब भी उनके बोल ना फूटे । कुछ देर हम भी ख़ामोश रहे  । फ़िर धीरे से अपनी कुर्सी उनके पास खिसकाई । वो हमसे कतराते हुए वो अपनी कुर्सी में और सिमटके बैठ गए । उनका वो अंदाज़ देखके मुस्कुराये बिना ना रहा गया हमसे । यह जो मुस्कराहट होती है यह गुस्से की जानी दुश्मन होती है । बड़ी बेदर्दी से इतराते हुए खून कर दिया हमारे इतने जायज़ गुस्से का ।

फिर हमने यूँही कुछ पूछ लिया उनसे और वो कुर्सी छोड़ बाहर चले गए । हम बाहर गए तो वो अन्दर आ गए । हमने कुछ कहा तो उन्होंने जवाब में नज़रों से कातिलाना तीर चला दिये लेकिन हम भी जान की बाज़ी लगाये मैदान-ए- इश्क़ में डटे रहे । उफ्फ ! जितना हम मनाने की कोशिश करें वो उतना ही बनावटी अकड़ में आते चले गए । हाय ! लेकिन कितने मासूम और कातिल लग रहे थे गुस्से में मुहँ फुलाए । फिर हमने कुछ देर उन्हें अकेला छोड़ दिया सोचा हमसे छुपा लों मगर हम अकेले इस आग में जल रहे हों ऐसा तो नहीं है । हम जान रहे थे कि जनाब रूठना एन्जॉय कर रहे थे ।

हमने कुछ और काम निपटाए और दुपहर का खाना बनाने का वक़्त हो चला तो हमने सोचा एक कोशिश और कर लेते हैं । जनाब को जनाब के ही अंदाज़ में घेर लेते हैं । जब कभी मैं उनसे बात नहीं करती तो वो पूछते हैं ‘मुहँ में दही क्यूँ जमा रखा है ?’ हम उनके पास बहुत ही संजीदा होके गए और पूछा ‘ सोच रही हूँ खाने में दही आलू बना लूं, ठीक रहेगा? ’ उन्होंने नज़रें चुराए चुराए सर हाँ में हिला दिया । हमने कहा तो ‘ थोड़ा दही दे दो, कल रात से अब तक तो काफ़ी जमा लिया होगा तुमने ’ । रोकते रोकते भी उनके चेहरे पे मुस्कान आ ही गयी । 

हम कुछ देर तो उस मुस्कान में खो गए और फिर उन्हें उनकी छोटी सी मुस्की (मुस्कान) के साथ छोड़ जाने को पलट गए । तभी वो कूद के हमारे पीछे पहुँच गए और ज़ोर से हमारा हाथ पकड़ लिया । हमने मुस्कान छुपाते हुए कहा ‘ छोड़ो, दर्द हो रहा है ‘ और इतना सुनके वो खिलखिलाके हंस पड़े । और हमने बाज़ी मार ली ।

सच कहूँ एक मुस्कान एक छोटी सी बात को बड़ा सा फ़साना बनने से रोक लेती है । तो हँसते रहिये और हँसाते रहिये ।

🙂

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7 Comments Add yours

  1. Deepak says:

    Wah, base hi nayab andaz mein sulah ka achcha Rasta bata diya. Is muskurahat k kisses ne khushi k ehsas ka Naya sama bana Diya.
    Nice one.

    Liked by 1 person

  2. thenewagedad says:

    Really well written. Some emotions pour out so beautifully in Hindi. Well done. Keep going.

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      Thank you 🙂

      Liked by 1 person

  3. How sweet..😍
    How beautifully written..indeed

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      Thank you Shweta 🙂

      Liked by 1 person

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