फ़िर एक बार हम रेलवे स्टेशन पहुँच गए और……

आप सब भी जानते होंगे कि रेलवे स्टेशन में कहीं भी चाहे वो सीढ़ियाँ हो या प्लेटफार्म आप किसी से ज़रा सा हटने को कह दें तो एहसास होता है दुनिया में कितने लोग आँख और कान की समस्याओं से जूझ रहे हैं  । हालाँकि देखने में सब बिल्कुल दुरूस्त दिखाई देते है । सारे लोग ऐसे ही नहीं होते । कुछ ऐसे भी होते हैं जो आपकी फ़रियाद सुनते हैं और नज़रों से ऐसा जवाब देते हैं जिसका आपकी मदद से कोई लेना देना नहीं होता । और कुछ तो ऐसे होते हैं जिनकी जुबां से ऐसे बोल फूटते हैं कि आपको तुरंत ही अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है । तो लोग चाहे जैसे भी हों आपको रास्ता मिलने की कोई गुंजाईश नहीं होती यह बात अपनी जगह पत्थर की लकीर है । यह बात हम उस दिन समझे जब हम चिल्ला रहे थे कि ‘ हमारी ट्रेन छूटने वाली है ‘ तब भी लोगों ने हमे रास्ते के अलावा सब दिया जैसे कि क़ातिल नयन बाण, कटाक्ष और धक्का वो भी उल्टी दिशा में ।

लेकिन एक बात लोगों के बारे में समझना अभी बाकी था । तो प्रभु की अपार अनुकम्पा से यह सुअवसर भी हमे जल्दी ही मिला । बात तब की है जब हम एक ट्रेन यात्रा करके लखनऊ रेलवे स्टेशन पे पहुँचे । हाथ में एक बैग था और एक बैग (पिट्ठू) पीठ पे था । हम अभी तीसरी ही सीढी किसी तरह से जूझ कर रास्ता बनाते हुए उतर पाए थे और हमारा मनोबल काफ़ी ऊँचा हो गया था । लेकिन यह क्या  कमबख्त अगली सीढी पे हमारे पैर ठीक से नहीं जम पाए और हम फिसल गए । ताजुब्ब की बात यह है कि हमारे फ़िसलते ही सारी सीढ़ियाँ, पूरा रास्ता साफ़ हो गया और हम धडधडाते हुए पागल दरिया की तरह बह चले ।

हैरानी हुई कि आगे जाने वालों को पीछे से आते इस तूफ़ान का पता कैसे चल रहा था ! वैसे तो सब आंख, कान के रोगी मालूम देते हैं । लोग इस तेज़ी से हमारे लिए रास्ता छोड़ रहे थे कि फिसलते हुए भी हमारे चेहरे पे मुस्कान आ गयी और लोगों की खामोश नज़र कह रही थी “मोहतरमा पहले आप जायें आपको काफ़ी जल्दी मालूम देती है” ।

हम अपना बिंदास फनफनाता सफ़र पूरा करके आख़िरी सीढी पे जा पहुँचे । याद नहीं आता इतनी तेज़ी से कभी हमने ३०-३५ सीढियाँ उतरी हों या किसी को उतरते देखा हो । नीचे पहुँच कर हम उठे तो सामने एक पट पे लिखा था “मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं” ।

हमने सोचा क्या सिचुएशनल हिसाब क़िताब है ! फिर एक बार पलटके ऊपर देखा तो अचानक ही अपना ऊँचा मनोबल और उन्नत भाल याद आ गया और दिल से निकला

“जो जितना ऊँचा, उतना एकाकी होता है, मेरे प्रभु मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना” ।

अटल बिहारी वाजपाई जी की इन पंक्तियों ने हमारे लिए अलग ही मतलब ले लिया ।

मुस्कुराये कि अटल जी भी लखनऊ के ही हैं । फिर मुस्कान पोछते हुए ख़ुद को समेटते हुए जैसे ही क़दम बढाया हमारा संगीतप्रेमी मन बोल उठा

आह ! आह ! आउच ! अरे रे सब कुछ दुखने लगा हो मोरा जियरा …..” ।

🙂

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2 Comments Add yours

  1. Deepak says:

    Hahahaha wonderful, great journey n awesome Hindi narrative. Loved it, write some more in Hindi.

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    1. hemasha says:

      thank you. 🙂 keep checking.

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