चल छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ चल छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ -Hindi blog

कभी रिश्तदारों से मिलने, कभी क़ुदरत से रूबरू होने तो कभी घूमने फ़िरने वजह कोई भी हो भारतीय रेल का जिक्र आ ही जाता है । हर बार सफ़र में कुछ ऐसा ख़ास होता है जो यादों में हमेशा के लिए बस जाता है । कई बार रेल का सफ़र बहुत यादगार होता है और कई बार तो रेल तक पहुँचने का सफ़र इतना रोमांचक हो जाता है कि कहना ही क्या । मेरे जीवन में ऐसे कई यादगार सफ़र रहे हैं जिनमे ट्रेन की भूमिका बहुत ही अहम् रही है । आज यादों की क़िताब से एक ऐसा ही पन्ना मैं आपके साथ पढ़ना चाहती हूँ ।

तो क़िस्सा कुछ यूँ है कि MCA के दूसरे सेमेस्टर के इम्तेहान के बाद हॉस्टल से घर जाना था, यानी कि इंदौर से लखनऊ । यह सफ़र दो हिस्सों में बटा हुआ होता था, पहला हिस्सा ट्रेन पकड़ने का सफ़र और दूसरा हिस्सा ट्रेन का सफ़र । ट्रेन पकड़ने के लिए इंदौर से भोपाल बस से जाना होता था जो की अमूमन ४ (4) घंटों का सफ़र था । हालांकि दूरी दोनों शहरों के बीच लगभग १६९ (169) किलोमीटर है और हर बार बस कंडक्टर ३ (3) घंटे में पहुँचा देने का दम भरते थे, लेकिन सड़क की हालत कहें या रोडवेज की बसों की बदहाली सफ़र में ४ (4) घंटे तो लगेंगे ही । रात को ९ (9:00) बजे ट्रेन पुष्पक भोपाल से लखनऊ जाने के लिए इस बार चुनी हमने । तो हमने अंदाज़ा लगाया, तजुर्बे का फायदा उठाने की कोशिश भी की और हॉस्टल से दोपहर १ (1:00) बजे खा-पीके, सज-धजके टनाटन निकल लिए ।

‘छोटे छोटे शहरों से खाली बोर दुपहरों से हम तो झोला उठाके चले

ओहो हो हम चले हम चले ओय रामचंद्र रे’

थोड़ा समय लगा भट्ट सूअर ढूँढने में । ओह! आप सोचते होंगे कि यह किस बला का नाम है, दरअसल इंदौर में टेम्पो को कहते हैं भट्ट सूअर । तो कुछ समय बाद हम सरवटे बस स्टैंड पर अपने सारी साजो-सज्जा के साथ खड़े थे । हम मतलब मैं और मेरी कानपुर की सखी शिल्पी । लगभग १:४० (1:40) हो गया था और अगली बस २:३० (2:30) की थी । हमारे पास समय ही समय था तो कोई हड़बड़ी नहीं थी ।

बस के समय पर कंडक्टर आया और बताया कि कोई राजनैतिक रैली और सम्मलेन है जिसकी वजह से इंदौर से देवास का रास्ता बाधित है तो हमारी बस उज्जैन होते हुए भोपाल जाएगी । हमने पूछा समय कितना लगेगा तो जवाब आया ६ (6) घंटे । हमारा रोमांच शुरू हो चुका था ,दोनों शहरों में २५४ (254) किलोमीटर की दूरी है। मतलब कहने का यह कि अगर बस ठीक से चली तो हम ८:३० (8:30) पे भोपाल पहुंचेंगे और हमारी ट्रेन थी ९ (9:00) बजे की ।

‘दिल थाम चले हम आज किधर कोई देखे कोई देखे

बेचैन जिगर बेताब नज़र कोई देखे कोई देखे’

तमाम दुआओं के साथ सफ़र शुरू हुआ और हम खानपान के शहर इंदौर से महाकाल की नगरी उज्जैन पहुँचे । सोचा देखें इस बार कौन कौन से स्टॉप आते हैं बीच में। मुझे इंदौर भोपाल के बीच के स्टॉप मुहंज़बानी याद थे और बहुत अच्छा लगता था सफ़र में ढेरों पवनचक्कियों का सिलसिला । अक्सर सहयात्रियों की बकचक से मुहं फ़ेर के पवनचक्की (windmills) को असमान छूते देखना बहुत ही सूकून देता था और कई ख्यालों को भी हवा मिलती थी । हर बार वही रास्ता होने पे भी कभी बोरियत का एहसास नहीं हुआ, हाँ लेकिन कोई रोमांच भी नहीं था, एक चितपरिचित सा एहसास था । सोचा चलो मन को ट्रेन छूटने की गणित से हटायें और रास्ते पे लगायें । लेकिन थोड़ी ही देर में मायूसी हो गयी क्यूंकि हम उज्जैन दर्शन के बाद देवास पहुँचे । जो सफ़र १ (1) घंटे का था उससे हमने ३ (3) घंटे में पूरा किया । ऐसी कोफ़्त हुई राजनीती और सम्मेलनों से कि जितना इज़हार किया जाये कम है । बाकी का सफ़र हमने इन दोनों को कोसने में ही बिताया । ८ (8) बज गया था और हम भोपाल नहीं पहुँच पाए थे । कंडक्टर का कहना था की भोपाल में हालत और भी बुरी है, सभी बड़े नेताओं की सुरक्षा के मद्देनज़र कई रास्ते बंद हैं और जो चल रहे हैं उनपे यातायात बहुत धीमा है । हमारी सूरतें देखकर उसका मन पसीज उठा और उस दयालु आत्मा ने हम मीनाकुमारियों को सुझाया कि बस स्टॉप तक मत जाओ हम भोपाल शुरू होते ही आपको उतार देंगे और आप ऑटो कर लेना सीधा रेलवे स्टेशन । हमने उसे दुआएं दी और वैसा ही किया । ऑटो मिला उसने फिर वही सब बताया जो हम बस में सुन चुके थे । हमने कहा,” भैय्या, चलोगे?” वो बोला १२० Rs (120) लगेंगे । हमने कहा ले लेना बस पहुँचा दो ।

भई वो ऑटो यात्रा भी अपने आप में एक पूरा कांड था । ओहोहो! ऐसे ताबड़तोड़ ऑटो भागा जा रहा था वो भी ना जाने किन सुनसान गलियों से । खैर, हम साबुत और पूरे सामान के साथ भोपाल रेलवे स्टेशन पहुँचे ८:५७ (8:57) पर । ऑटो वाले को १५० Rs (150) दिये और बचे हुए रुपये लिए बिना भागे स्टेशन के अन्दर । हॉस्टल में जो लोग रहे हैं वो भली तरह समझते हैं ३० Rs (30) का मोल , पर क्या करते उस समय कानों में आवाज़ आ रही थी ‘यात्रीगण कृप्या ध्यान दें गाड़ी संख्या 12534 मुंबई से चलकर भोपाल के रास्ते लखनऊ को जाने वाली पुष्पक प्लेटफार्म संख्या २ पे आ रही है ।’ मुस्कुराये कि चलो एन्क्वायरी काउंटर की लाइन से बचे और बढ़ चले उम्मींद का मजमा लिए प्लेटफार्म संख्या २ की तरफ़ । काफ़ी भारी मजमा था , दो बड़े बैग्स और एक पर्स बराबर । अभी हम प्लेटफार्म संख्या १ (1) की लगभग ४० (40) सीढीयाँ चढ़के ऊपर पहुँचे ही थे कि मुनादी हुई ‘यात्रीगण कृप्या ध्यान दें गाड़ी संख्या 12534 मुंबई से चलकर भोपाल के रास्ते लखनऊ को जाने वाली पुष्पक प्लेटफार्म संख्या २ (2) पे आ चुकी है ।’ ऐसा लगा हमारा पूरा शरीर कान ही कान हो गया, ढ़ेरों कान, जैसे ऐसा करने से अनाउंसमेंट में बदलाव आ जायेगा । ओह! तो ९ बजे ५ मिनट (9:05) हो गए हमे अपना सामान ऑटो से निकाल के चढ़ाके यहाँ तक पहुंचते । उस समय ऐसी बेताबी थी कि हम उड़कर बाकी की दूरी तय कर लेते अगर जो प्रभु ने हमे पंख दिये होते । हमे अपने साधारण मनुष्य होने पर शायद ही कभी और इतना रोष हुआ हो । हम प्लेटफार्म २ की ऊपरी सीढी पे थे और हमे अभी लगभग ४० (40) सीढीयाँ उतरनी थी । और हमने गौर किया है कि जब भी जल्दबाजी होती है ना जाने कहाँ से ढेर सारी भीड़ आ जाती है । शाहरुख़ भाई ने कहा था ‘जब भी किसी चीज़ को हम शिद्दत से चाहते हैं तो सारी कायनात हमे उससे मिलाने की साजिश करती है’ । खुदा ही जाने कायनात की यह कैसी साजिश थी क्यूंकि हमे हमारी शिद्दत पे तो कोई शक नहीं था । हमने कहा भी ‘ओ पिछे हो जा नि पिछे हो जा सोनिये साड्डी रेलगड्डी आई’ । पर तब एहसास हुआ कि दमदार आवाज़ ना होना कितना बड़ा नुकसान है मानव जीवनयापन के लिए ,ख़ासकर सफ़र के दौरान ।

जब तक हम नीचे पहुँचे ट्रेन काफ़ी तेजी से प्लेटफार्म और स्टेशन दोनों छोड़ रही थी और हम वहाँ हांफ रहे थे और सोच रहे थे कि यह एक हादसा और अब हम कभी नहीं कह पायेंगे ‘आज तक लाइफ में एक ट्रेन नहीं छूटी मेरी, बाबाजी थैंक्यू, आपने रिकॉर्ड टूटने से बचा लिया’ । लेकिन मासूम दिल को यह पता तब भी ना चला कि अब तो ट्रेन छूटने के रिकॉर्ड बनेंगे हमारे ।

पाठक परेशान ना हों हम सकुशल अपने घर पहुँचे, एक नई रेल यात्रा करके । उसका विवरण देंगे तो एक और ब्लॉग तैयार हो जायेगा लेकिन उस नए ब्लॉग और इस ब्लॉग के बीच एक ब्रेक तो बनता है भई । तो फिर मिलेंगे नए चर्चे लेके । अलविदा ।

‘गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है

चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है’

🙂

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