काश ! हम तुम और सच मिल पाते – Hindi blog

हॉस्टल पहुँचे तो घर वालों से दूर होने का दुःख, अपने सहूलियत वाले घोंसले से दूर होने का दुःख, रैगिंग का डर, नए लोगों को दूसरे ग्रह का प्राणी समझने का रोग और अपने प्यारे दोस्त से बिछ्ड़ जाने की त्रासदी ।

एक ही बात ना जाने कितनी बार याद की मैंने, शायद इतना ही था मेरे बस में । फिर शायद लगभग २ महीने बाद मैंने अपना अहम् छोड़ अपने प्यारे दोस्त को मेल की, छोटी सी और बहुत ही औपचारिक सी ।

सोचा मेरी मेल का रिप्लाई ज़रूर आयेगा मगर ऐसा हुआ नहीं । मन में कैसे कैसे ख्याल आये और गए। फिर १० दिन बाद एक और मेल की मैंने औपचारिक सी ।

लेकिन उसका भी रिप्लाई नहीं आया । लगने लगा या तो हमे मेल लिखना ही नहीं आता या शायद उसने कभी दोस्त समझा ही नहीं । दिल को ठेस लगी, मायूसी हुई, मायूसी और बढ़ी, फिर गुस्सा आया, और लगा कि मैं भी छोड़ दूँ लेकिन उसका चेहरा आँखों से हटता ही नहीं था । उसकी मुस्कान याद आती तो लगता हल्की सी ठंडी हवा का झोंका आया । उसकी खिलखिलाहट याद आती तो लगता ढेरों फूल बरस पड़े हों ।

एक बार फिर से उसे मेल करने को बेबस कर दिया यादों ने । सोचा पता तो करूँ कि दूर होके मुझपे इतना असर रखते हैं वो पास वालों पे क्या कहर ढा रहे होंगें, मेरे साथ हसीन वक़्त बिताने वाले मुझसे बेख़बर कैसे रह रहे होंगे।

दिल ने कहा थोड़ी मदद दिमाग की भी ले लो, क्या पता रिप्लाई आ ही जाये । दूर होके इस तरह कब तक तड्पो, कोई जुगत लगाओ । एक रिप्लाई ही तो चाहिए ।और उसने ख़ुद ही कहा था कि ” आय ऍम नॉट गुड एट मैन्टैनिंग फ्रेंडशिप ।” तो मेरा फ़र्ज बनता है दोस्ती का यह रिश्ता संभालने का ।

अगले दिन मैंने उसको मेल की, सच और झूठ की खिचड़ी लिख दी । लिखा लखनऊ की बहुत याद आती है और यहाँ अजीब से लड़के हैं । कोई गुलाब देता है, कोई कार्ड देता है और मुझे समझ नहीं आ रहा कैसे निपटू इन सब से? और सेंड बटन क्लिक ।

अरे!! येह क्या हुआ!!!!! रिप्लाई आया, अगले ही दिन 🙂  बहुत ही संजीदा रिप्लाई, कैसे रहना है, लड़के कैसे बदमाश होते हैं, वगैरह वगैरह 🙂  मैं पढ़ते पढ़ते हंस रही थी और हॉस्टल आने के बाद शायद पहली बार मैं इतनी खुश थी । उस दिन एक बात समझ आई, यह दुनिया इमानदारी से नहीं चलती है थोड़ी थोड़ी बेईमानी भी चाहिए । बिना झूठ तो मेल का रिप्लाई तक नहीं आता ।

खैर मुझे झूठ- सच, ईमानदारी- बईमानी इनका इतना ख्याल नहीं था जितना उस ख़ुशी का था जो रिप्लाई आने से मिली । पूरे दिन में ख़ुश रही और एक बार उसको रिप्लाई क्लिक करना सिखा दिया तो दोबारा मेहनत करनी नहीं पढ़ी । दिन महीनो में बदल गए और महीने सालों में, सिलसिला चलता रहा । जब हम दोनों की बेहतरीन कैंपस प्लेसमेंट हो गयी तो झटका लगा । अरे! यह तो सुहाना समय बीतने की घड़ी आ गयी । अब नौकरी के साथ तो घर पे शादी की बातें शुरू हो जायेंगी। और हमने कभी यह तो एक दूसरे को कहा नहीं कि “……….” हम तो बस एक दूसरे के बेस्ट फ्रेंड्स हैं

एक बार को लगा कि सच का सामना कर लूं । उसे बताऊँ कि उसके बिना जीने के ख्याल से दिल कांपता है मेरा । फिर सोचा कहीं सच बता के पूरी तरह खो ना दूँ उसे । कहीं उसको ऐसा कुछ लगता ही ना हो और वो कह दे कि अब रास्ते अलग करना ही ठीक है । आखिर मैंने तो पहली मेल का रिप्लाई भी झूठ के सहारे पाया था । शायद मेरा, उसका और सच का मेल बैठता ही नहीं है । ऐसे में जितना उसे पा पाई हूँ वो भी खो दूँगी । “आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी मिली ना पूरी पाये” और पापा भी नहीं मानेंगे । तो सच्चाई का टुनटुना बजा के मिलेगा क्या? सिर्फ़ नुक्सान ।

बेहतर है कि में ख़ुद को तैयार करूँ उससे दूर होने के लिए । दिल और दिमाग में भरपूर जंग होती थी, दिन हो या रात । कभी दिल जीतता तो में खुश हो जाती और फ़ोन करने चल पड़ती उसे । उन दिनों हमारे पास मोबाइल नहीं था । हॉस्टल में VCC “वर्चुअल कालिंग कार्ड” का इस्तेमाल करके बात होती थी । हम हर बार १०० Rs का कार्ड लेते थे । उसमे एक बार घर पे और एक बार उससे बात करते थे । लेकिन कभी जब दिमाग जीत जाता तो में फूट फूट के रोती और ग़ालिब साहब को सुनती ।“प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी?” कई बार ऐसी संगीन लडाईयों के बाद एक दिन दिल कड़ा किया और उसके हॉस्टल वाला नंबर जिस कागज़ पे लिखा था उसे फाड़ डाला । उस दिन मन में आर या पार का फ़ैसला चल रहा था । कागज़ फाड़ कर फ़ेंक दिया और २ मिनट बाद दिल ने ऐसा दर्द दिया कि बदहवास होकर चले VCC लेने । कार्ड लिया लेकिन नंबर तो ठीक से याद था नहीं । पूरे १०० Rs की रॉंग नंबर कॉल्स की मैंने । कार्ड बैलेंस खत्म और साथ में हम भी खत्म । दिल ने दिमाग को भरपूर कोसा कि “हद्द कर दी आपने” । अब तो बस एक ही आसरा था कि वो फ़ोन कर ले ।

🙂

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